Saturday, March 18, 2017

[gita-talk] मोह क्या होता है और इससे कैसे बचें - What is 'Moha", and How to be saved from it ?



This brings closure to this topic.  Thank you all.   

Gita-talk moderators, Ram Ram   


मोह सकल ब्याधिन कर मूला - सारी कमियों का मूल कारण मोह है। यह मोह हमारे व्यवहार में किस तरह जुड़ता है और कैसे मैं इससे बच सकता हूँ, कृपया बताएं। राम राम .... मन मोहन बत्रा

The root of all short-comings (flaws, evils) is 'moha' (a form of ignorance / delusion, a form of attachment due to being - enchanted, enamoured, entranced, allured).  How does this 'moha' come into our relationships, and how am I to be saved from it.  Please kindly let me know.   Ram Ram    
Man Mohan Batra  


बहुत धन्यवाद। आपने तो मोह क्या है इसके साथ-2 मोह से स्वयं को छुड़ाने/हटाने का रामबाण - हमारी श्रीराम के चरणों में प्रीति हो जाए - रामचरितमानस में से ही समझा दिया है। और यह भी कि साधना के पथ पर चलते हुए क्या ठीक चल रहा हूँ, कहाँ तक पहुंचा हूँ - यह भी अपनी प्रगति और अपनी स्थिति को देखकर जान भी सकता हूँ। बहुत-2 धन्यवाद।

राम राम।

Man Mohan Batra

Shree Hari

Man Mohanji Ram Ram! ... Prasna ke liye dhanyavad

Gita: 2/62-63 describes beautifully the chain of desire to Moha:
. Brooding on the sense objects lead to attachment (Raga)
. Attachment leads to desire
. Desire to anger
. Anger to Moha (delusion)
. Delusion to loss of memory
. Loss of memory to loss of power of reasoning
. Loss of reason to utter ruin

Under Moha (delusion), man does not know-- right from wrong, Sat (real) from Asat (unreal) etc.  

Also, Moha is prevalent-- when a person knows very well what is right but he still does the just opposite.   
Example from Mahabharta-- Many times Vidurji and Bhisham Pitamah came to Dhritarastra to advise him that what Duryodhana was doing is totally wrong, Dhritarastra agreed with them that they are right and are giving him good advice, then he said whenever Duryodhana shows up in front of him, he forgets everything and supports Duryodhana blindly in right or wrong, whatever he does.  Thus, Moha takes over Dritrasatra completely!
The same is also true many times in today's lifestyle.

Moha is primarily due to the attachment (Raga) with the ever changing body and the world (sense of me and mine), desiring sense pleasures from the fleeting world.  Inspite of being disappointed again and again, individual still pursues to derive pleasures from the world (like a mirage, it appears to be true but really it is not there). World is not the problem but our assumed relationship is.

At the end of Gita in Verse 18/72, Lord asked Arjuna is your Moha gone? 
In Verse 18/73, Arjuna responds:
"nasto mohah smriti labdha tvatprasaddan"  
Yes, my delusion is destroyed, my memory has come back with Thy grace. 

Tulsidasji says in Ramacaritamanasa:
'moha nisa sabu sovanihara dekhia sapana aneka prakara'  
ehi jaga jamini jamini jogi, paramarathi prapapamca biyogi 
jana tabahi jiva jag jaga, jaba saba bisaya bilasa biraga'     ...  (Ayodhya Kanda, 1-2/93)

"Everyone is slumbering in the night of delusion and while asleep one sees dreams of various kinds. in this night of mundane existence it is Yogis (mystics) alone who keep awake (Yogis who are in quest of of the highest truth and remain aloof from the world. A soul should be deemed as awake from the night of the world only when he develops dispassion from the enjoyments of the senses."

Also, pls. refer to Gita: 2/69.

Ram Ram!

Humble regards,
Madan Kaura


Dear Sadhakas,
Hare Krishna.
This is in response to a question from a fellow Sadhaka regarding Moha.
Moha, ( attachment) comes from materialism.

Lord Krishna says in Bhagavad Gita,
" Vita raga bhaya krodha,
Man maya mam upasritah,
Bahavo jnana tapasa,
Puta mad bhavam agatah."
    ( Gitaji,4,10).
which means,
"Being freed from attachment, fear,and anger, fully absorbed in Me and taking refuge in Me, many in the past became purified by My knowledge  and attained transcendental love for Me."

The way to overcome moha, is by realization that we are not this body and the purpose of this life is to advance spiritually and attain Him in the end. There is only one way to achieve this in Kali Yuga and that is by chanting of  the Holy Names. Kaliyuge smaranan muktihi, which means Chanting of the Holy Names is the way for liberation. Study of Bhagavad Gita and association with the devotees, make that easier.

Thank You.

Prasad A.Iragavarapu, MD


Dear Sadaks,
It is from previous birth vasana. You was as deer. Depending upon Moha we can decide previous birth as said by Sri Adi Sankara. One will crazy on sugar. He/she was ant. One will crazy on food taste though his stomach will be filled, but he will taste a bit. He was pig. So on. To get rid of this you need not be afraid. You talk to your MOHA by witnessing it. Example: When I see a good dress, I say, " You are blessed with cloths, Oh you mind are you crazy, there are so many without dress- so be contended". When I see beautiful woman, I say to my mind," You stupid mind- your mother, sister etc have same organs- why you are falling pray to that- you had so many desires fulfilled- so much sufferings- all in so many births- Oh you mind want to kill me- Oh mind (Chitta) want to give me more births, when I can attain ever lasting happiness- leave me alone you stupid mind". 
Sadaks- this is also a type of sadana.
Sadaks one more example:- When we dream riding a car, we are without total body, but we see everything without eyes etc. So is ultimate happiness without body, we can enjoy eternal happiness without body in Mukythi/ moksha state.
So this moha only is culprit pinning us on earth with body. So we should remain witness and talk to our chitta (Mind).


मनमोहन भैया, साधकका अनुभव है कि मोह होता ही तब है जब किसी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिको ममताकी डोरसे स्वयंके साथ जोड़ लेते हैं और यह काम न तो (पुराना) प्रारब्ध करती है और न ही कोई दूसरा करता है अपितु हम स्वयं ही (नया) करते हैं इसलिए हम ही इसे हटा सकते हैं। । ममता हटी नहीं कि मोह गायब हुआ। किसी भी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थितिके साथ प्रयोग करके देख लीजियेगा। 
गीता वार्ता समन्वयक द्वारा सुझाया लेख संसारमें रहनेकी विद्या ममतासे छूटनेकी सरल कार्य-विधि बताता है। 


हरि शरणं,

श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड (१२१ से १२२) से:
सुनहु तात अब मानस रोगा    | जिन ते दुख पावहिं सब लोगा ||
मोह सकल ब्याधिन कर मूला   | तिन ते पुनि उपजहिं बहु शूला ||
काम वात कफ लोभ अपारा    | क्रोध पित्त नित छाती जारा   ||
प्रीति करहिं जौ तीनिउ भाई    | उपजई सन्निपात दुखदाई     ||
विषय मनोरथ दुर्गम नाना     | ते सब शूल नाम को जाना   ||
ममता दादु कंडु इरषाई        | हरष विषाद गरह बहुताई     ||
पर सुख देखि जरनि सोइ छई | कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई      ||
अहंकार अति दुखद डमरुआ    | दम्भ कपट मद मान नेहरूआ ||
तृष्ना उदरबृद्धि अति भारी      | त्रिबिध ईषना तरुन तिजारी   ||
जुग विधि ज्वर मत्सर अबिबेका | कहँ लगि कहौं कुरोग अनेका ||
एक व्याधि वश नर मरहिं, ए असाधि बहु ब्याधि |
पीडहिं संतत जीव कहँ, सो किमि लहै समाधि   || १२१ क ||
नेम धर्म आचार तप, ग्यान जग्य जप दान     |
भेषज पुनि कोटिन नहिं, रोग जाहिं हरियान     || १२१ ख ||
श्रीकागभुशुण्डी [श्रीगरुणजी से "मानस रोग" बारे में] बताते हैं कि "मोह अर्थात अविद्या/भ्रम" ही सारे व्याधियों / रोगों / दुखों का कारण है जिससे काम, क्रोध, लोभ, काम-क्रोध-लोभ के एक साथ होने से मानसिक सन्निपात, अनेको विषयों सम्बन्धी दुर्गम मनोरोग, ममता, ईर्ष्या, हर्ष, विषाद, दूसरों के सुख से होने वाला दुख, दुष्टता, कुटिलता, अहंकार, दम्भ, कपट, मद, मान, तृष्णा, लोकेष्णा, वित्तेषणा, पुत्रेषणा, मत्सर, अबिवेका इत्यादि रोग उत्पन्न होते हैं | मनुष्य एक साधारण रोग से ही मर जाता है तो इतने असाध्य रोगों के होते हुए वह कैसे समाधि (शान्ति) को प्राप्त कर सक्ता है? ये सब रोग नियम, धर्म, आचरण, तप, ज्ञान, जग्य, जप, दान आदि करोणों ओषधियों से भी नहीं समाप्त हो सकते |
             एहि बिधि सकल जीव जग रोगी | शोक हरष भय प्रीति बियोगी ||
             मानस रोग कछुक मैं गाये      | हैं सब के लखि बिरलेन पाए ||
             जाने ते छीजहिं कछु पापी      | नाश न पावहिं जन परितापी ||
              विषय कुपथ्य पाइ अंकुरे      | मुनिहु हृदय का नर बापुरे    ||
इस प्रकार हर्ष, शोक, भय, प्रेम तथा बियोग से युक्त संसार के सभी जीव मानस रोगों से पीड़ीत हैं | मैने कुछ मानस रोग कहे हैं, ये सबके पास हैं, पर बहुत ही कम लोग इसको पहचान पाते हैं | ये पापी मानस रोग जानने पर कुछ क्षीण तो होते हैं परन्तु नष्ट नहीं होते | ये मुनियों के भी हृदय में विषयरुप कुपथ्य पाकर अंकुरित हो जाते हैं तो साधारण मनुष्यों की क्या बात ?
              राम कृपा नासहिं सब रोगा     | जौ एहि भाँति बनै संयोगा    ||
             सद्गुरु बैद बचन बिश्वासा        | संजम यह न विषय कै आशा ||
             रघुपति भगति सजीवन मूरी     | अनुपान श्रद्धा मति पूरी      ||
           एहि बिधि भलेहिं सो कुरोग नसाहीं  | नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं ||
केवल श्रीरामजी की कृपा से ही ये सब रोग नष्ट हो पाते हैं जिसको प्राप्त करने के लिये सद्गुरुरूप वैद्य के वचन पर विश्वास तथा विषय की आशा-त्याग रूपी संयम करते हुए श्रद्धायुक्त बुद्धि रूपी शहद के साथ भगवान श्रीराम की भक्ति रूपी संजीवनी ओषधि का पान करना पड़ता है | अन्यथा करोणों उपाय करने से भी ये रोग नष्ट नहीं हो सकते |
जानिय तब मन बिरुज गोसाँई  | जब उर बल बिराग अधिकाइ ||
सुमति छुधा बाढ़इ नित नई    | विषय आस दुर्बलता गई      ||
बिमल ग्यान जल जब सो नहाई | तब रह राम भगति उर छाई ||
मन को तभी रोग से रहित जानना चाहिये, जब वैराग्यरूप हृदय का बल अधिक हो जाये | जब सात्विकबुद्धिरूपी क्षुधा निरन्तर नये रूप मे बढ़ने लगे | जब विषयों की आशारुप दुर्बलता चली गयी हो | जब निर्मल ज्ञान मे स्नान हो जाये तब हृदय में श्रीरामभक्ति छाई रहती है अर्थात तब वह मानस रोगों से पूर्णतया छूट जाता है |  
शिव अज शुक सनकादिक नारद | जे मुनि ब्रह्म विचार बिशारद ||
सब कर मत खगनायक एहा    | करिय राम पद पंकज नेहा    ||
श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं     | रघुपति भगति बिना सुख नाहीं ||
हे गरुणजी! शिवजी, ब्रह्माजी, शुकाचार्य, सनकादि, नारद और जो भी ब्रह्मविचार में चतुर मुनिगण हैं, उन सबका एकमात्र यही निश्चित मत है कि, भगवान श्रीराम के श्रीचरणकमलों में स्नेह करना चाहिये | वेद, पुराण और सभी ग्रन्थ यही कहते हैं कि रघुपति अर्थात जीवमात्र के पालक भगवान श्रीराम की भक्ति के बिना सुख है ही नहीं |
कमठ पीठ जामहिं बरु बारा     | बंध्या सुत बरु काहुहि मारा   ||
फुलहिं नभ बरु बहुबिधि फुला   | जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला ||
तृषा जाइ बरु मृगजल पाना    | बरु जामहिं शश शीष विषाना ||
अंधकार बरु रबिहिं नसावै      | राम बिमुख न जीव सुख पावै ||
हिम ते अनल प्रगट बरु होई    | बिमुख राम सुख पाव न कोई ||
              बारि मथे घृत होइ बरु, सकता ते बरु तेल      |
बिनु हरि भजन न भव तरिय, यह सिद्धांत अपेल || १२२ क ||  
भले कछुवे के पीठ पर बाल जम जायें, चाहे बन्ध्या का पुत्र किसी को मार सके, भले ही आधारहीन आकाश में बहुत प्रकार के फूल विकसित हो जायें, फिर भी श्रीहरि के प्रतिकूल रहकर जीव सुख नहीं पा सकता | भले ही मृगजल के पान से प्यास बुझ जाये, चाहे खरगोश के सिर पर सींग जम जाये , चाहे अन्धकार सूर्यनारायण को छिपा दे, परन्तु श्रीराम से विमुख होकर जीव सुख नहीं पा सकता | चाहे बर्फ से अग्नि प्रकट हो जाये, परन्तु श्रीराम से बिमुख होकर कोई सुख नहीं पाता | भले जल के मथने से घी निकल आये, परन्तु भगवान के भजन के बिना जीव भवसागर से नहीं पार हो सकता, यह सिद्धांत अकाट्य है |
             मशकहिं करई विरंचि प्रभु, अजहिं मशक ते हीन |
             अश बिचारि तजि संशय, रामहिं भजहिं प्रबीन   || १२२ ख ||
प्रभु श्रीरामजी मच्छर को ब्रह्मा बना देते हैं और तथा ब्रह्म को मच्छर से भी छोटा कर देते हैं | ऐसा विचार करके संशय छोड़कर चतुर लोग भगवान श्रीराम का ही भजन करते हैं |
धन्यबाद |
नीतीश दूबे 


If translated in English it will be great


मन मोहन जी,   
Please read the following in HINDI  -  

Please share key points with the group.   
Gita Talk Moderators,   Ram Ram  


Dear Sir/Madam,

You should be doing "Thinking Divine, 24/7" (Simran in Gita). It will help.




Posted by: Sadhak <>
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