Tuesday, February 28, 2017

[gita-talk] असत का आदर कैसे मिटे How to get rid of the respect that we have given to the 'ASAT' (Unreal)

 

How to get rid of the 'aadar'  (respect, reverence, esteem) that we have for the 'ASAT'  (Unreal - that which has no existence of its own) ?  

From Swamiji's discourses I have come to know that the respect (esteem, regard, reverence, value, regard etc) that we have for ASAT -  (unreal,  that which does not exist on its own),  perishable things, relationships etc., that itself is sin.     After this,  I started thinking,  that in all relationships there is regard  - respect - value etc.,  then with what kind of thought process can we get rid of the regard that we have given to the 'asat' - unreal and perishable things ?  Please explain the mechanism - process in detail .  Ram Ram    Man Mohan Batra. 


असत का आदर कैसे मिटे

स्वामीजी के प्रवचन से मालूम हुआ कि असत् - नाशवान वस्तु, सम्बन्ध आदि का जो आदर है वह ही पाप है। मैं इस के बाद सोचने में लग गया कि हर व्यवहार में मन में इनका आदर तो होता ही है तो यह असत् का आदर किस तरह की सोच रखने से मिटेगा, कृपया प्रक्रिया सहित विस्तार से बतलाइये। राम राम।। .... मनमोहन बत्रा

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[gita-talk] Please Clarify - In liberation does Jeevatama becomes Part of Paramatma ? i.e. Paramatma Swaroopa ?

 

Ram Ram

Just joined this group.
Sorry, i shall be using english as i do not know Hindi typing...

जीवात्मा क्या है ?  जीव कब जीवात् मा होता है? जीव  कब आत्मा होता है?

When Jeev meets Ishwar ?? 
Does after MUKTI it becomes a part of Paramatama or Jeeva Atma swarupa remains? (like a drop of water becomes Sea after meeting it or Identity of Atma (me myself remains).. for example does it happens if someone is chanting Ram, does he/she attains Ram swarupa and Mix with Ram and other one if is chanting Shiva becomes Shiva Swarupa and Mix with Shiva... and so on...

Please Clarify. 

RAM RAM

Jai  P. Sharma  

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HINDI READERS :   PLEASE LISTEN TO OTHER 



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[gita-talk] मोह क्या होता है और इससे कैसे बचें - What is 'Moha", and How to be saved from it ?

 




मोह सकल ब्याधिन कर मूला - सारी कमियों का मूल कारण मोह है। यह मोह हमारे व्यवहार में किस तरह जुड़ता है और कैसे मैं इससे बच सकता हूँ, कृपया बताएं। राम राम .... मन मोहन बत्रा

IN ENGLISH
    
The root of all short-comings (flaws, evils) is 'moha' (a form of ignorance / delusion, a form of attachment due to being - enchanted, enamoured, entranced, allured).  How does this 'moha' come into our relationships, and how am I to be saved from it.  Please kindly let me know.   Ram Ram    
Man Mohan Batra  

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मनमोहन भैया, साधकका अनुभव है कि मोह होता ही तब है जब किसी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिको ममताकी डोरसे स्वयंके साथ जोड़ लेते हैं और यह काम न तो (पुराना) प्रारब्ध करती है और न ही कोई दूसरा करता है अपितु हम स्वयं ही (नया) करते हैं इसलिए हम ही इसे हटा सकते हैं। । ममता हटी नहीं कि मोह गायब हुआ। किसी भी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थितिके साथ प्रयोग करके देख लीजियेगा। 
गीता वार्ता समन्वयक द्वारा सुझाया लेख संसारमें रहनेकी विद्या ममतासे छूटनेकी सरल कार्य-विधि बताता है। 
सविनय,
साधक 

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हरि शरणं,

श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड (१२१ से १२२) से:
सुनहु तात अब मानस रोगा    | जिन ते दुख पावहिं सब लोगा ||
मोह सकल ब्याधिन कर मूला   | तिन ते पुनि उपजहिं बहु शूला ||
काम वात कफ लोभ अपारा    | क्रोध पित्त नित छाती जारा   ||
प्रीति करहिं जौ तीनिउ भाई    | उपजई सन्निपात दुखदाई     ||
विषय मनोरथ दुर्गम नाना     | ते सब शूल नाम को जाना   ||
ममता दादु कंडु इरषाई        | हरष विषाद गरह बहुताई     ||
पर सुख देखि जरनि सोइ छई | कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई      ||
अहंकार अति दुखद डमरुआ    | दम्भ कपट मद मान नेहरूआ ||
तृष्ना उदरबृद्धि अति भारी      | त्रिबिध ईषना तरुन तिजारी   ||
जुग विधि ज्वर मत्सर अबिबेका | कहँ लगि कहौं कुरोग अनेका ||
एक व्याधि वश नर मरहिं, ए असाधि बहु ब्याधि |
पीडहिं संतत जीव कहँ, सो किमि लहै समाधि   || १२१ क ||
नेम धर्म आचार तप, ग्यान जग्य जप दान     |
भेषज पुनि कोटिन नहिं, रोग जाहिं हरियान     || १२१ ख ||
 
श्रीकागभुशुण्डी [श्रीगरुणजी से "मानस रोग" बारे में] बताते हैं कि "मोह अर्थात अविद्या/भ्रम" ही सारे व्याधियों / रोगों / दुखों का कारण है जिससे काम, क्रोध, लोभ, काम-क्रोध-लोभ के एक साथ होने से मानसिक सन्निपात, अनेको विषयों सम्बन्धी दुर्गम मनोरोग, ममता, ईर्ष्या, हर्ष, विषाद, दूसरों के सुख से होने वाला दुख, दुष्टता, कुटिलता, अहंकार, दम्भ, कपट, मद, मान, तृष्णा, लोकेष्णा, वित्तेषणा, पुत्रेषणा, मत्सर, अबिवेका इत्यादि रोग उत्पन्न होते हैं | मनुष्य एक साधारण रोग से ही मर जाता है तो इतने असाध्य रोगों के होते हुए वह कैसे समाधि (शान्ति) को प्राप्त कर सक्ता है? ये सब रोग नियम, धर्म, आचरण, तप, ज्ञान, जग्य, जप, दान आदि करोणों ओषधियों से भी नहीं समाप्त हो सकते |
 
             एहि बिधि सकल जीव जग रोगी | शोक हरष भय प्रीति बियोगी ||
             मानस रोग कछुक मैं गाये      | हैं सब के लखि बिरलेन पाए ||
             जाने ते छीजहिं कछु पापी      | नाश न पावहिं जन परितापी ||
              विषय कुपथ्य पाइ अंकुरे      | मुनिहु हृदय का नर बापुरे    ||
 
इस प्रकार हर्ष, शोक, भय, प्रेम तथा बियोग से युक्त संसार के सभी जीव मानस रोगों से पीड़ीत हैं | मैने कुछ मानस रोग कहे हैं, ये सबके पास हैं, पर बहुत ही कम लोग इसको पहचान पाते हैं | ये पापी मानस रोग जानने पर कुछ क्षीण तो होते हैं परन्तु नष्ट नहीं होते | ये मुनियों के भी हृदय में विषयरुप कुपथ्य पाकर अंकुरित हो जाते हैं तो साधारण मनुष्यों की क्या बात ?
 
              राम कृपा नासहिं सब रोगा     | जौ एहि भाँति बनै संयोगा    ||
             सद्गुरु बैद बचन बिश्वासा        | संजम यह न विषय कै आशा ||
             रघुपति भगति सजीवन मूरी     | अनुपान श्रद्धा मति पूरी      ||
           एहि बिधि भलेहिं सो कुरोग नसाहीं  | नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं ||
     
केवल श्रीरामजी की कृपा से ही ये सब रोग नष्ट हो पाते हैं जिसको प्राप्त करने के लिये सद्गुरुरूप वैद्य के वचन पर विश्वास तथा विषय की आशा-त्याग रूपी संयम करते हुए श्रद्धायुक्त बुद्धि रूपी शहद के साथ भगवान श्रीराम की भक्ति रूपी संजीवनी ओषधि का पान करना पड़ता है | अन्यथा करोणों उपाय करने से भी ये रोग नष्ट नहीं हो सकते |
 
जानिय तब मन बिरुज गोसाँई  | जब उर बल बिराग अधिकाइ ||
सुमति छुधा बाढ़इ नित नई    | विषय आस दुर्बलता गई      ||
बिमल ग्यान जल जब सो नहाई | तब रह राम भगति उर छाई ||
 
मन को तभी रोग से रहित जानना चाहिये, जब वैराग्यरूप हृदय का बल अधिक हो जाये | जब सात्विकबुद्धिरूपी क्षुधा निरन्तर नये रूप मे बढ़ने लगे | जब विषयों की आशारुप दुर्बलता चली गयी हो | जब निर्मल ज्ञान मे स्नान हो जाये तब हृदय में श्रीरामभक्ति छाई रहती है अर्थात तब वह मानस रोगों से पूर्णतया छूट जाता है |  
      
शिव अज शुक सनकादिक नारद | जे मुनि ब्रह्म विचार बिशारद ||
सब कर मत खगनायक एहा    | करिय राम पद पंकज नेहा    ||
श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं     | रघुपति भगति बिना सुख नाहीं ||
 
हे गरुणजी! शिवजी, ब्रह्माजी, शुकाचार्य, सनकादि, नारद और जो भी ब्रह्मविचार में चतुर मुनिगण हैं, उन सबका एकमात्र यही निश्चित मत है कि, भगवान श्रीराम के श्रीचरणकमलों में स्नेह करना चाहिये | वेद, पुराण और सभी ग्रन्थ यही कहते हैं कि रघुपति अर्थात जीवमात्र के पालक भगवान श्रीराम की भक्ति के बिना सुख है ही नहीं |
 
कमठ पीठ जामहिं बरु बारा     | बंध्या सुत बरु काहुहि मारा   ||
फुलहिं नभ बरु बहुबिधि फुला   | जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला ||
तृषा जाइ बरु मृगजल पाना    | बरु जामहिं शश शीष विषाना ||
अंधकार बरु रबिहिं नसावै      | राम बिमुख न जीव सुख पावै ||
हिम ते अनल प्रगट बरु होई    | बिमुख राम सुख पाव न कोई ||
              बारि मथे घृत होइ बरु, सकता ते बरु तेल      |
बिनु हरि भजन न भव तरिय, यह सिद्धांत अपेल || १२२ क ||  
 
भले कछुवे के पीठ पर बाल जम जायें, चाहे बन्ध्या का पुत्र किसी को मार सके, भले ही आधारहीन आकाश में बहुत प्रकार के फूल विकसित हो जायें, फिर भी श्रीहरि के प्रतिकूल रहकर जीव सुख नहीं पा सकता | भले ही मृगजल के पान से प्यास बुझ जाये, चाहे खरगोश के सिर पर सींग जम जाये , चाहे अन्धकार सूर्यनारायण को छिपा दे, परन्तु श्रीराम से विमुख होकर जीव सुख नहीं पा सकता | चाहे बर्फ से अग्नि प्रकट हो जाये, परन्तु श्रीराम से बिमुख होकर कोई सुख नहीं पाता | भले जल के मथने से घी निकल आये, परन्तु भगवान के भजन के बिना जीव भवसागर से नहीं पार हो सकता, यह सिद्धांत अकाट्य है |
                   
             मशकहिं करई विरंचि प्रभु, अजहिं मशक ते हीन |
             अश बिचारि तजि संशय, रामहिं भजहिं प्रबीन   || १२२ ख ||
प्रभु श्रीरामजी मच्छर को ब्रह्मा बना देते हैं और तथा ब्रह्म को मच्छर से भी छोटा कर देते हैं | ऐसा विचार करके संशय छोड़कर चतुर लोग भगवान श्रीराम का ही भजन करते हैं |
   
धन्यबाद |
नीतीश दूबे 

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If translated in English it will be great
B.sathyanarayan

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ShriHari 
मन मोहन जी,   
Please read the following in HINDI  -  


Please share key points with the group.   
Gita Talk Moderators,   Ram Ram  

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Dear Sir/Madam,

You should be doing "Thinking Divine, 24/7" (Simran in Gita). It will help.

Av


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[gita-talk] How to do Gita Paath ?

 

||ShriHari||


QUESTION:   

Gita is written in Sanskrit,  we cannot  pronounce the sanskrit words  properly, and cannot even understand the meaning properly. In such a state,  how should we read the Gita ?   



SWAMIJI :   

Read the meaning of the Gita instead. There is a book that has come out called Gita Madhurya.  It has the explanation of the entire Gita in both Hindi and English. It is in a question answer format. Very beautifully one, in a very simple way,  and is very easily understood.   

A gentlemen, who is a great scholar in Sanskrit,  who has achieved the highest marks as an 'acharya',  he too said that he gained true knowledge and understanding of Gita, by reading the Gita Madhurya.  Gita could not be understood as well, as was understood through reading Gita Madhurya.    

Therefore read the Gita Madhurya 

Please click on LINK to listen to Swamiji's response in HINDI











BOOKS links ----  



AUDIO:



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www.swamiramsukhdasji.org -  hindi    


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