Tuesday, February 9, 2016

[gita-talk] Re: [gita-talk-hindi] समझना है

 

Shri Hari 

PLEASE DO NOT CC:   EVERYONE... AND DEFINITELY DO NOT CC:  

sadhak@swamiramsukhdasji.net
sadhak_insight@yahoo.com

The reason for setting up a group was so the message went to one group email id.   which is   

gita-talk-hindi@googlegroups.com

Thank you,   Ram Ram  

 



From: amit gupta <amitgupta83@gmail.com>
To: Gaurav Mittal <gamittal@outlook.com>
Cc: "Rtgsjb2@gmail.com" <rtgsjb2@gmail.com>; sarvottam varma <sarvottam1934@gmail.com>; gita talk <gita-talk@yahoogroups.com>; "gita-talk-hindi@googlegroups.com" <gita-talk-hindi@googlegroups.com>; sadhak_insight <sadhak_insight@yahoo.com>; Sadhak <sadhak@swamiramsukhdasji.net>; sadhaka <sadhaka@yahoogroups.com>
Sent: Monday, February 8, 2016 1:35 AM
Subject: Re: [gita-talk-hindi] समझना है

Ram Ram,

Dear Gaurav prabhu,

We are here for satsang not for kutark. 

Question like aap jeev ho ya aatma? Next somebody can ask are you Bramh or not? Next can be asked are you Mukt or not? etc. etc..

Vyas ji is not here to give us respect. He is here to tell his thoughts and experience. He mentioned the Swami ji saying that "poochne vala moorkh or uttar dene vala maha moorkh". to ky ab swami ji par bhi blame lagaaynege.

Aaap kabhi swami swamisharnanandji ko sunie, vo bhi satsang ke samay khoob ulta seedha bolte hai, par unka intenstion apmaaan karne ka nahi hota...vo chahte hai ki saamne vala samjh jaaye. 


<<Mei sevak sacharachar rup bhagvant - that is ananya bhakta. >> aap man lo ki Vyas ji abhi itne bade bhakt nahi hue sayad.

<<When you enter satsang, you have to respect everyone as Paramatma resides is in them.>> Bilkul sahi hai. We all should try this. 
Vyas ji bhi karenge.

<<Anyways, if this basic principle cannot be followed, I can remove myself from this discussion group. >>

Vyas ji ki baat kisi ko buri lag gai to aap group chod denge? kal ko kahi or satsang karne jaayenge uha par bhi Vyas ji jaise log mil jaayenge to aap uha si bhi chale jaaynege? 

Meri haath jodkar nivedan hai prabhu chodkar na jaaye.  Meri koi baat buri lagi ho to Maaf keejiyega.

Ram Ram


-------- Original message --------
From: Gaurav Mittal <gamittal@outlook.com>
Date: 02/08/2016 12:04 AM (GMT-06:00)
Subject: RE: [gita-talk-hindi] समझना है

Dear Vyas,

If you really knew the truth, then you will see everyone as manifestation of your Paramatma and you will respect everyone.  You will avoid disrespectful statements. 

Mei sevak sacharachar rup bhagvant - that is ananya bhakta. 

When you enter satsang, you have to respect everyone as Paramatma resides is in them. 

Anyways, if this basic principle cannot be followed, I can remove myself from this discussion group. 





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-------- Original message --------
Date: 02/07/2016 10:41 PM (GMT-06:00)
To: Gaurav Mittal <gamittal@outlook.com>
Subject: Re: [gita-talk-hindi] समझना है

Dear Mr Gaurav

When we don't know spiritual status of any person , why do we ask personal questions? If we ask such Q , as Savinay Maharaj asked, should we not remain prepared to get answer ? 

My intention has never been to hurt any one. I have my own way of writing answer - SVABHAAVASTU PRAVARTATE. Actually, one who enters satsanga, should keep the likes and dislikes aside, should keep the desire for respect aside and then enter. Who demands respect ? One who believes that he is short of respect, actually that person who does not deserve respect. Revered Swamiji used to say - मेरा सम्मान हो जाय, इसी चाहना ने आपका अपमान कराया है ! Please treat us respectfully, is not a usual demand of Satsangi. You don't come to Satsanga for respect, you come to Satsanga for TRUTH. 

Come to Sarvottamji - We have been together on this Forum from Day 1. In the instant Q , which has reached to this ugly state now, I tried to explain in different ways, with different angles. 4-5 different  answers to the same Q were given. Are you aware? One way was to state - ऐसे प्रश्न न तो पूछे जाते हैं, न उत्तर दिये जाते हैं । In another message, the same Q was answered with different angle. Then there was another answer given with a third perspective. He did not notice the different answers to the same Q and caught evil, started blame game. That was something, which deserved stunning reply. Clear ? Baba - keep your eye ONLY on the answer, only on Truth. You will never be able to get respect on demand, I don't enter Satsanga to give or take respect. I enter Satsanga to share truth. For taking or giving respect there are other markets in life. 

Jai Shree Krishna

Vyas N B 

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On 08-Feb-2016, at 1:43 AM, Gaurav Mittal <gamittal@outlook.com> wrote:

Gita-talk moderators have asked how to improve the group. One thing they can do to stop members from posting judgmental posts. 

Vyas message is very hurtful. He writes as if he is knowledgeable person and makes derogatory statements. One thing which you can do is stop these comments. 

You don't know spiritual status of any person. Please treat everyone with respect. 



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-------- Original message --------
Date: 02/07/2016 12:33 PM (GMT-06:00)
To: amit gupta <amitgupta83@gmail.com>
Subject: Re: [gita-talk-hindi] समझना है


सर्वोत्तमजी महाराज

किसीने परम श्रद्धेय स्वामीजी से भी ऐसा ही प्रश्न पूछा था और उन्होंने जो उत्तर दिया वह उत्तर यदि हम दे देते तो तो आप पता नहीं क्या लिखते ! उन्होंने यह कहा था कि ऐसा प्रश्न पूछनेवाला बहुत बड़ा मूर्ख होता है और उत्तर देने वाला महामूर्ख होता है !

आप पूर्वाग्रह की जो बात कह रहे हैं, यह सही नहीं है ! सही क्या है ? सही यह है कि जो दोष आपमें कूट-कूट कर भरा हुआ है, वही दोष , आपका स्वयंका दोष आपको दूसरोंमें दीख रहा है ! यह नियम है कि यदि क़िसीमें कोई दोष न हो, तो उसको दूसरोंमें दोष दीख ही नहीं सकता - असंभव बात है कि आपमें दोष नहीं हो और दूसरेमें दिख जाय - असंभव शब्दका अर्थ आप जानते ही होंगे । आपकी हर बात का उत्तर बाक़ायदा दिया गया है - आपका हो सकता है यह आग्रह हो कि जो आपको उत्तर सुहाता है, वही उत्तर मिले - यह संभव नहीं है - और यही आपका पूर्वाग्रह है ! आपका स्वयंका पूर्वाग्रह आपको मुझमें दिख रहा है ! कहा भी है - जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि ।

मैं भी गीता-टाक ग्रुप से ८/१० सालसे जुड़ा हूँ ! आपके पूर्वाग्रह ग्रसित सैकड़ों नहीं, हज़ारों प्रश्न पढ़ चुका हूँ और उत्तर दे चुका हूँ ! लेकिन क्या आप अर्जुन मीराबाई बन गये ? नहीं बने ! आपके पास स्वामीजी की कुछ पुस्तकें भी होंगी- क्या फ़र्क़ पड़ा ? जैसे आपके फ़र्क़ नहीं पड़ा , वैसे ही दूसरोंके फ़र्क़ नहीं पड़ता वरना आपको असंख्य अर्जुन और असंख्य मीराबाई नज़र आती ! क्यों फ़र्क़ नहीं पड़ा ? पूर्वाग्रह !!! इसको छोड़ो बाबा !!! कुछ नहीं मिलेगा माथे की खुजली से ! आपको समझा-समझा कर यह ग्रुप थक गया कि जहाँ बुद्धि का कोई काम ही नहीं है, वहाँ निरन्तर परिवर्तनशील बुद्धि मत लगाओ बाबा - लेकिन आप माने ? क्यों नहीं माने ? पूर्वाग्रह !! बुरा मत मानिये , यह सत्संग सभा है - यहाँ सत्य मिलना ही चाहिये - कड़वा हो या मीठा ! सच्ची बात यह है कि आप " नास्तिक" हैं , आपमें आस्था का कण भी नहीं है ! लिख लीजिये इस बात को ! आपके पास स्वामीजी की कुछ पुस्तकें ज़रूर होंगी पर उनको आप ग़लतियाँ ढूँढने के लिये ही पढ़ते हैं - या गीतटाक ग्रुपमें अपनी विचित्र विद्वता प्रदर्शित करने हेतु प्रयोग करते हैं । यह बात मैं आपके सैकड़ों प्रश्न पढ़ने के बाद कह रहा हूँ - मेरी कही बात प्रमाण से सिद्ध हो जायगी ! दरअसल आपको उत्तर से कोई मतलब ही नहीं है ! 

ख़ैर - आपमें विद्यमान परमात्माको प्रणाम ।
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On 07-Feb-2016, at 12:31 PM, Rtgsjb2@gmail.com <rtgsjb2@gmail.com> wrote:

हरि ओम

इसीलिये मैंने कहा अमितजी कि ऐसे प्रश्न न तो पूछे जाते हैं और न उत्तर दिये जाते हैं ! आप जीवात्मा हैं या नहीं - सप्रमाण उत्तर दें - कैसा विचित्र प्रश्न है ! इस प्रश्न पर न हँसना बनता है, न रोना ! आप दो देखें प्रमाण कि आप कौन है - जीवात्मा, महात्मा या अल्पात्मा ! अरे - साधारण व्यक्ति भी यह जानता है कि इस सृष्टिमें वह जीव है - प्रकृतिके परवश उत्पन्न हुआ जीव ! क्या उत्तर दें , ऐसे प्रश्न का ? क्या यह कोई समझदारी वाला प्रश्न है ? 

जय श्री कृष्णा

व्यास एन बी 

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On 07-Feb-2016, at 12:17 PM, amit gupta <amitgupta83@gmail.com> wrote:

<<बड़े भैया, आप 'जीवात्मा' हैं या नहीं?
सप्रमाण बताइयेगा। >>

आपको प्रश्नो का उत्तर ई-मेल के द्वारा मिल रहा है यही इस बात का प्रमाण है की उत्तर देने वाला जीवात्मा है|

ram ram

2016-02-07 2:18 GMT+05:30 sarvottam varma <sarvottam1934@gmail.com>:
बड़े भैया, प्रश्न व्यक्तिगत इसलिये पूछा गया (आप 'जीवात्मा' हैं या नहीं?) क्योंकि आपके जितने भी उत्तर होते हैं उनमें आपका पूर्वाग्रह स्पष्ट नजर आता है। पूर्वाग्रह क्या? पूर्वाग्रह यह कि प्रश्नकर्ता 'मान्यतासे ग्रस्त है और आप मान्यतासे ग्रस्त नहीं हैं जबकि आप इसी मान्यतासे ग्रस्त हैं कि प्रश्नकर्ता किसी न किसी मान्यतासे ग्रस्त है।
आपको उत्तर नहीं देना है तो मत दीजिये, नाराज होनेसे तो कभी काम बनता नहीं। 
आप अकेले गीता-वार्ताको नियंत्रित कर रहे हैं जबकि स्वामीजीका हमेशा यह कहना था,''पूछो, क्या पूछना है?'' उन्होंने कभी नहीं कहा कि यह प्रश्न मत पूछो या यह प्रश्न नहीं पूछना चाहिये। आपने कहा है। साधक ने नहीं माना। 
पूछनेका साहस है इसीलिये कहनेका भी साहस है। 
गीता-वार्ता के स्वरूप (कैसे प्रश्न पूछे जायँ और कैसे उत्तर दिये जायँ) में आवश्यकतानुसार बार-बार परिवर्तन नहीं किया गया तो उसका उद्देश्य सफल होनेकी संभावना कम है। 28000 सदस्योंमेंसे कितने प्रश्न पूछनेके लिये सामने आते हैं? क्या वे सभी आपके समान सुविज्ञ हो चुके हैं? सत्साहित्य और प्रवचन का मंथन नहीं किया जायगा तो वह प्रभावी कैसे होगा? वह साहित्य भूतकालमें प्रभावी रहा है (अर्जुनको बोध हुआ) कहनेसे आजके अर्जुनको भी बोध हो जायगा क्या? ऐसा होता होता तो आज असंख्य अर्जुन और असंख्य मीराबाई होतीं जबकि नजर आती नहीं। 
अस्तु। 
सविनय,
साधक 



2016-02-07 5:02 GMT+11:00 Rtgsjb2@gmail.com <rtgsjb2@gmail.com>:
हरि ओम

ऐसे प्रश्न न पूछे जाते हैं, न उत्तर दिये जाते है , मान्यवर ! "सप्रमाण" उत्तर माँगना तो और भी विचित्र है !

परन्तु  निम्नलिखित बात पर उत्तर देना बनता है - 

निष्कर्ष यह कि सारे झंझट व्यर्थ बनाये हुये हैं (माने हुये हैं) इसलिये (स्वामीजीके शब्दोंमें) अब चुप हो जाना ही अच्छा। 

आपको मालूम है ये "चुप" होना वास्तवमें क्या होता है ? समझिये - 

" सत्तामात्र होनेसे स्वयं स्वत: ही "चुप" है । परन्तु गलती यह होती है कि सत्तामात्रका अनुभव न करके अपनेमें क्रियाका अनुभव करते हैं कि " मैं करता हूँ " । स्वयं में कोई क्रिया नहीं है; अत: क्रिया करते समय भी यह दृष्टि रहनी चाहिये कि " मैं कुछ भी नहीं करता हूँ" । मनुष्य भोजन करते समय " मैं करता हूँ" - ऐसे अपनेको कर्ता मानता है, पर भोजन पचनेकी क्रियाका कर्ता अपने को नहीं मानता । वास्तवमें भोजन करते समय भी वह उसका ज्ञाता हुआ, कर्ता कैसे हुआ ? "

कुछ समझमें आया, मित्र ? वरना बेहिचक पूछिये !! "कुछ न करने से" स्वरूपमें स्थिति स्वत: होती है - यह कुछ न करना, "चुप" होना है ! यह कैसे हो ? इसके लिये -

" अपने में निरन्तर अकर्तृत्वका अनुभव होना चाहिये कि " मैं कुछ नहीं करता हूँ" " नैव किण्चित्करोमीति" - यही तत्त्वज्ञान है, यही जीवन्मुक्ति है ! सभी क्रियायें प्रकृति विभागोंमें है ! जैसा है, वैसा जाननेका नाम "ज्ञान" है , अपनेको अकर्ता अनुभव करना "ज्ञान" है ! स्वरूपमें ( सत्तामें, होनेपनमें) न क्रिया है, न पदार्थ है- ऐसा अनुभव करना जीवन्मुक्तिका लक्षण है !

 इस बातको आज आज ही एकान्तमें बैठकर स्थाई कर लो, फिर यह अपने-आप दीखने लगेगी !!

जय श्री कृष्णा

व्यास एन बी 

 ( और अब चुप "होना" है )  ।



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On 06-Feb-2016, at 1:06 PM, sarvottam varma <sarvottam1934@gmail.com> wrote:

बड़े भैया, आप 'जीवात्मा' हैं या नहीं?
सप्रमाण बताइयेगा। 
सविनय,
साधक 

2016-02-06 15:38 GMT+11:00 Rtgsjb2@gmail.com <rtgsjb2@gmail.com>:

बड़े भैया, जब आत्मामें कुछ भी परिवर्तन होता ही नहीं तो वह आत्माकी श्रेणीसे जीवात्माकी श्रेणीमें कैसे आ जाता है?

बाबा ! कहा न - "मान्यता" में क्रिया होती ही नहीं ! जब क्रिया होती ही नहीं तो परिवर्तन का प्रश्न कैसे उठेगा ? क्रियारहित आत्मा जब "मान्यता" कर लेता है, तो उसकी संज्ञा " जीवात्मा" हो जाती है ! परिवर्तन कहाँ हुआ, महाराज ? 
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On 06-Feb-2016, at 1:46 AM, sarvottam varma <sarvottam1934@gmail.com> wrote:

बड़े भैया, जब आत्मामें कुछ भी परिवर्तन होता ही नहीं तो वह आत्माकी श्रेणीसे जीवात्माकी श्रेणीमें कैसे आ जाता है?
जब आत्मामें कुछ भी परिवर्तन होता ही नहीं और आत्मा कभी भी परमात्मासे अलग होता ही नहीं तो चाहे कुछ भी हुआ करे (कैसी भी मान्यता हो या न हो) आत्मामें क्या फर्क पड़ा? आत्मासे अलग जिस किसीमें भी फर्क पड़ा हो तो उससे आत्माको करना ही क्या? निष्कर्ष यह कि सारे झंझट व्यर्थ बनाये हुये हैं (माने हुये हैं) इसलिये (स्वामीजीके शब्दोंमें) अब चुप हो जाना ही अच्छा। 
सविनय,
साधक 

2016-02-05 19:52 GMT+11:00 Rtgsjb2@gmail.com <rtgsjb2@gmail.com>:
हरि ओम

स्वरूप से पहले निर्विकल्प शब्द का प्रयोग, यह नहीं बताता कि स्वरूप कई प्रकार के होते हैं, जैसा आपकी निरन्तर परिवर्तनशील बुद्धि मान बैठी है - यह केवल मात्र स्वरूप का विशेषण और महिमा स्वरूप शब्द है ! यहाँ विकल्प शब्दका अर्थ यह माना जाना चाहिये कि जीव की मान्यता में संसार/प्रकृति न आ जाय ! मेरे तो गिरधर गोपाल पुस्तक अभी मेरे पास नहीं है, हो या न हो , गीता कहती है ना - "शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते" !  तो वैसे भी जीवात्मा शरीरमें रहता हुआ भी कर्ता-भोक्ता नहीं "बनता" है ! "बनता" नहीं है , कभी नहीं "बनता" !!!! "मान" लेता है कि मैं बन गया - "बनता नहीं" ! जैसे, सविनयजी महाराज, आप मान लो कि मैं राजा हूँ , तो आप राजा "बने" नहीं, "मान" लिया !

कहा ना, महाराज, सब "मान्यता-ही-मान्यता" ( स्वीकृति- ही-स्वीकृति) है ! आत्मा "मानने" के  तथा " न मानने" के अलावा और कुछ कर ही नहीं सकती ! "मान्यता" में क्रिया होती नहीं है ! आपने सुना नहीं कि आत्मा "अकर्ता, अविकारी, ....अविनाशी, ध्रुव, अचल, ...वग़ैरा वग़ैरा है ? सुना / पढ़ा है ना, महाराज ? गीता साफ़ - साफ़ कहती है या नहीं ? कहती है ना भाई ? तो क्या मतलब है उसका ? यही कि जीव "मान" लेता है - असत् को सत् मान लेता है ! अब आप अपने आपको राजा न होते हुए भी राजा मान लो, तो कौन रोक सकता है आपको ?

जय श्री कृष्णा 

व्यास एन बी

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On 04-Feb-2016, at 2:23 AM, sarvottam varma <sarvottam1934@gmail.com> wrote:

जीवात्माके बारेमें कहा है : अगर यह अपने निर्विकल्प स्वरूपमें स्थित रहे तो शरीरमें रहता हुआ भी कर्ता-भोक्ता नहीं बनता। 
(पुस्तक 'मेरे तो गिरधर गोपाल' पृष्ठ 78)
यह 'निर्विकल्प स्वरूप' क्या होता है? स्वरूपके और कितने प्रकार हैं? कृपया समझाइयेगा। 
सविनय,
साधक 
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On 06-Feb-2016, at 1:06 PM, sarvottam varma <sarvottam1934@gmail.com> wrote:

बड़े भैया, आप 'जीवात्मा' हैं या नहीं?
सप्रमाण बताइयेगा। 
सविनय,
साधक 

2016-02-06 15:38 GMT+11:00 Rtgsjb2@gmail.com <rtgsjb2@gmail.com>:

बड़े भैया, जब आत्मामें कुछ भी परिवर्तन होता ही नहीं तो वह आत्माकी श्रेणीसे जीवात्माकी श्रेणीमें कैसे आ जाता है?

बाबा ! कहा न - "मान्यता" में क्रिया होती ही नहीं ! जब क्रिया होती ही नहीं तो परिवर्तन का प्रश्न कैसे उठेगा ? क्रियारहित आत्मा जब "मान्यता" कर लेता है, तो उसकी संज्ञा " जीवात्मा" हो जाती है ! परिवर्तन कहाँ हुआ, महाराज ? 
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On 06-Feb-2016, at 1:46 AM, sarvottam varma <sarvottam1934@gmail.com> wrote:

बड़े भैया, जब आत्मामें कुछ भी परिवर्तन होता ही नहीं तो वह आत्माकी श्रेणीसे जीवात्माकी श्रेणीमें कैसे आ जाता है?
जब आत्मामें कुछ भी परिवर्तन होता ही नहीं और आत्मा कभी भी परमात्मासे अलग होता ही नहीं तो चाहे कुछ भी हुआ करे (कैसी भी मान्यता हो या न हो) आत्मामें क्या फर्क पड़ा? आत्मासे अलग जिस किसीमें भी फर्क पड़ा हो तो उससे आत्माको करना ही क्या? निष्कर्ष यह कि सारे झंझट व्यर्थ बनाये हुये हैं (माने हुये हैं) इसलिये (स्वामीजीके शब्दोंमें) अब चुप हो जाना ही अच्छा। 
सविनय,
साधक 

2016-02-05 19:52 GMT+11:00 Rtgsjb2@gmail.com <rtgsjb2@gmail.com>:
हरि ओम

स्वरूप से पहले निर्विकल्प शब्द का प्रयोग, यह नहीं बताता कि स्वरूप कई प्रकार के होते हैं, जैसा आपकी निरन्तर परिवर्तनशील बुद्धि मान बैठी है - यह केवल मात्र स्वरूप का विशेषण और महिमा स्वरूप शब्द है ! यहाँ विकल्प शब्दका अर्थ यह माना जाना चाहिये कि जीव की मान्यता में संसार/प्रकृति न आ जाय ! मेरे तो गिरधर गोपाल पुस्तक अभी मेरे पास नहीं है, हो या न हो , गीता कहती है ना - "शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते" !  तो वैसे भी जीवात्मा शरीरमें रहता हुआ भी कर्ता-भोक्ता नहीं "बनता" है ! "बनता" नहीं है , कभी नहीं "बनता" !!!! "मान" लेता है कि मैं बन गया - "बनता नहीं" ! जैसे, सविनयजी महाराज, आप मान लो कि मैं राजा हूँ , तो आप राजा "बने" नहीं, "मान" लिया !

कहा ना, महाराज, सब "मान्यता-ही-मान्यता" ( स्वीकृति- ही-स्वीकृति) है ! आत्मा "मानने" के  तथा " न मानने" के अलावा और कुछ कर ही नहीं सकती ! "मान्यता" में क्रिया होती नहीं है ! आपने सुना नहीं कि आत्मा "अकर्ता, अविकारी, ....अविनाशी, ध्रुव, अचल, ...वग़ैरा वग़ैरा है ? सुना / पढ़ा है ना, महाराज ? गीता साफ़ - साफ़ कहती है या नहीं ? कहती है ना भाई ? तो क्या मतलब है उसका ? यही कि जीव "मान" लेता है - असत् को सत् मान लेता है ! अब आप अपने आपको राजा न होते हुए भी राजा मान लो, तो कौन रोक सकता है आपको ?

जय श्री कृष्णा 

व्यास एन बी

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On 04-Feb-2016, at 2:23 AM, sarvottam varma <sarvottam1934@gmail.com> wrote:

जीवात्माके बारेमें कहा है : अगर यह अपने निर्विकल्प स्वरूपमें स्थित रहे तो शरीरमें रहता हुआ भी कर्ता-भोक्ता नहीं बनता। 
(पुस्तक 'मेरे तो गिरधर गोपाल' पृष्ठ 78)
यह 'निर्विकल्प स्वरूप' क्या होता है? स्वरूपके और कितने प्रकार हैं? कृपया समझाइयेगा। 
सविनय,
साधक 
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