Friday, January 1, 2016

[gita-talk] देने-लेनेकी बात समझना कठिन है, जब सब कुछ भगवान् का ही है

 

Shri  Hari

This brings a closure to this topic.  Thank you all for your responses. 
Gita Talk Moderators,  Ram Ram 

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जब सब कुछ भगवान् का ही है
जब सब कुछ भगवान् का ही है तो 7 नवंबर 2015 के सन्देशमें यह कथन : भक्त भावपूर्वक भगवान् को जो कुछ देते हैं, अर्पण करते हैं, उसको भगवान् ग्रहण करते हैं। समझना कठिन है। 
किसीके (यहाँ भक्तके) द्वारा कोई चीज देने पर उस चीजका देनेवालेसे (यहाँ भक्तसे) वियोग होता है। 
किसीके (यहाँ भगवान् के) द्वारा कोई चीज ग्रहण करनेमें उस चीजका ग्रहण करनेवालेसे (यहाँ भगवान् से) संयोग होता है। 
अन्यत्र कहा है : सृष्टिमात्रमें केश बराबर भी कोई चीज हमारी नहीं है अर्थात् हर चीजसे भक्तका नित्य वियोग है फिर पुन: किसी चीजका भक्तसे वियोग होना कैसे संभव है?
यह भी कहा है : सब कुछ, हम स्वयं भी भगवान् के ही हैं अर्थात् हर चीजका भगवान् से नित्य संयोग है फिर पुन: किसी चीजका भगवान् से संयोग होना कैसे संभव है?
यह देने-लेनेकी बात समझना कठिन है। 
कृपया समझाइयेगा। 
सविनय,
साधक

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गीता-वार्ता समन्वयक महोदयसे निवेदन है कि इस सूत्रका समापन करें। 
साधक चाहता था कि 'भगवान् को अर्पण करनेकी सरलतम विधि' (स्वामीजीने बताया है कि जो भी वस्तु भगवान् को अर्पण करना है, उसे अपनी मत मानो तो हो गया भगवान् को अर्पण क्योंकि सब कुछ है ही भगवान् का ही।) अन्य साधक भी जान जायँ। 
अस्तु। 
सविनय,
साधक

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बड़े भैया, अब आयी फुदकनेवाली बुद्धिकी मौत !
आपने खूँटी (स्वामीजीकी कही बात) बतायी नहीं कि बुद्धि उसपर जा टँगी। 
सूत्रका समापन करवा दीजियेगा। 
सविनय,
साधक
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Everything is God's. You are God's. If you accept that, then you have already offered everything to God. 

If you can't accept that you are God's and have sense of ownership towards objects, then Krishna says to offer objects to Him like patram, pusham, phalam, toyam ...

g a mittal

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in fact the nature of ones association with the prakruti is duality and in the state of duality there are two hence give and take is natural process . how ever when the give and take is motivated to develop relation with god, this illusion is destroyed gradually and one gets established in the existence of one and only one God ,thus all the doubts vanish.
with love ckkaul

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हरि ओम

सविनयजी महाराज । भाव आता है, बुद्धि को खूँटी पर टाँगने से । बुद्धि खूँटी पर कैसे टाँगे ? विवेक का आदर कीजिये । मानना सीखिये । जो बात सन्त कहते हैं, मान लीजिये - जब मान लोगे तो तो बुद्धि मेंढक की तरह थोड़ी फुदक सकती है, पर मानने पर हावी नहीं हो सकती - धीरे-धीरे मानना अनुभव बन जायेगा । आप जब भी स्वामीजी की कोई बात पढें, पहले से ही धारणा बनाकर पढें कि बात सच्ची ही है - सच्चाई अगर कहीं है, तो स्वामीजी की बात में है । आप स्वामीजी की बात को शरणागत की तरह पढ़िये - राणाजी कहे वहीं उदयपुर ।।। जो स्वामीजी ने कह दिया, वही सत्य, बस - ज़्यादा सोचने का काम रखो ही मत । स्वामीजी ने कह दिया ना, बात ख़त्म । यह विश्वास, बुद्धिको खूँटी पर टाँग देगा । संसारके काममें अक्कल लगाओ, स्वामीजी की बातोंका स्वीकार करने में अक्कल का काम है ही नहीं ।

जय श्री कृष्णा

व्यास एन बी
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There are different types of bhaktas.

1.) There are some bhakta who sees objects as belonging to them. For those bhakta, it is advised to offer those objects to Krishna. It is said ---

 भक्त भावपूर्वक भगवान् को जो कुछ देते हैं, अर्पण करते हैं, उसको भगवान् ग्रहण करते हैं। 

2.) There are some bhaktas who see themselves as God's. The body is God's and whatever exists is God's. Such bhaktas have actually offered everything to God. 

3.) There are some bhaktas who see everything as God's and as manifestation of God. (vasudeva sarvam) They are described in Bhagavatam as:

manasā vacasā dṛṣṭyā
gṛhyate 'nyair apīndriyaiḥ
aham eva na matto 'nyad
(Bhagavatam 11/13/24)

Within this world, whatever is perceived by the mind, speech, eyes or other senses is Me alone and nothing besides Me. All of you please understand this by a straightforward analysis of the facts.

Gosvami Tulsidas describes those ananya bhaktas as:

सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमन्त ।
मैं सेवक सचराचर रुप स्वामी भगवंत ॥
(मानस किष्किन्धा ३ )
That person is ananya bhakta who never deviates from this understanding - I am servant of all living entities in whom my master Bhagwan resides.

Please understand the context of Swamiji's statement and understand what kind of bhakta is he talking about. Then, your doubt will be resolved.

अन्यत्र कहा है : सृष्टिमात्रमें केश बराबर भी कोई चीज हमारी नहीं है अर्थात् हर चीजसे भक्तका नित्य वियोग है फिर पुन: किसी चीजका भक्तसे वियोग होना कैसे संभव है?

Please understand the truth. Truth is that self is beyond matter and matter can never is attained by self. So, there is always "nitya viyog" with matter. "sanyog" is illusory or assumed. When "sanyog" or "viyog" is discussed with self, it is always in terms of illusion.  You already know this fact. What is the doubt?

यह भी कहा है : सब कुछ, हम स्वयं भी भगवान् के ही हैं अर्थात् हर चीजका भगवान् से नित्य संयोग है फिर पुन: किसी चीजका भगवान् से संयोग होना कैसे संभव है?

You are trying to understand Bhagavan in terms of illusion. "sanyog" and "viyog" happen in matter. Matter is created and then, destroyed. Please understand this fact below:

That which was not in the past and which will not be in the future, but that which seeming exists only in present is called Unreal. Those objects, that have a beginning and an end, don't exist in the present as well. (आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा' - माण्डूक्यकारिका). 

How can "sanyog" or "viyog" can happen to unreal that does not exist? Real always exists. Real is always part of God. "sanyog" or "viyog" also don't happen to real also. "sanyog" or "viyog" both are illusory. So see God in terms of "sanyog" or "viyog".

I have used statements from shastra to resolve your doubts. Hope this helps.
g a mittal
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बड़े भैया, भावका ही तो अभाव है तभी बुद्धि इतनी उछलती है। 
भाव कैसे आये? बताइयेगा। 
सविनय,
साधक

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As all jeevas have freewill they are free to offer anything to god.
But since Krishna serves Gau, devta and Brahmins he accepts only patram, pushpam, phalam, toyam from his bhaktas/devotees.

Jeeva having freewill are offering even cooked food of all kinds including non-veg (in many religious practices).
But Krishna has categorically and unequivocally stated what he would accept/eat/drink.

regds,
rakesh

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In vast enormity of universe our activity is insignificant but even then cognized.  An insignificant blessing by His enormity works enormous upon us.

subhashtewari

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हरि ओम

है तो सब कुछ भगवान् का पर मान तो अपना आपने रखा है या नहीं ? ख़ैर , कभी साल- दो  साल के बच्चे पर ग़ौर करें ! वह अक्सर फ़र्श पर पड़ी चीज़ें उठाकर पिता को देता है - और पिता प्रसन्न हो जाता है ! अब घर भी पिता का, चीज़ भी पिता की, बच्चा भी पिता का, लेकिन बच्चे का जो भाव होता कोई चीज़ फ़र्श से उठाकर पिता को दे देना, वह भाव पिता को प्रसन्न कर देता है - है ना ? इसी तरह सब भगवान् का है, पर जो भक्त का भाव होता है ना, वह भगवान् को प्रसन्न कर देता है । 

सविनयजी महाराज - आप कोरा माथा लगाते हैं, इसकी बजाय आप भावों पर जाइये - बुद्धि से आप कहीं नहीं पहुँचेंगे - भाव से पहुँचेंगे । 

जय श्री कृष्णा

व्यास एन बी



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Shree Hari


Ram Ram 

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Posted by: Sadhak <sadhak_insight@yahoo.com>
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