Wednesday, December 30, 2015

[gita-talk] देने-लेनेकी बात समझना कठिन है, जब सब कुछ भगवान् का ही है

 





जब सब कुछ भगवान् का ही है
जब सब कुछ भगवान् का ही है तो 7 नवंबर 2015 के सन्देशमें यह कथन : भक्त भावपूर्वक भगवान् को जो कुछ देते हैं, अर्पण करते हैं, उसको भगवान् ग्रहण करते हैं। समझना कठिन है। 
किसीके (यहाँ भक्तके) द्वारा कोई चीज देने पर उस चीजका देनेवालेसे (यहाँ भक्तसे) वियोग होता है। 
किसीके (यहाँ भगवान् के) द्वारा कोई चीज ग्रहण करनेमें उस चीजका ग्रहण करनेवालेसे (यहाँ भगवान् से) संयोग होता है। 
अन्यत्र कहा है : सृष्टिमात्रमें केश बराबर भी कोई चीज हमारी नहीं है अर्थात् हर चीजसे भक्तका नित्य वियोग है फिर पुन: किसी चीजका भक्तसे वियोग होना कैसे संभव है?
यह भी कहा है : सब कुछ, हम स्वयं भी भगवान् के ही हैं अर्थात् हर चीजका भगवान् से नित्य संयोग है फिर पुन: किसी चीजका भगवान् से संयोग होना कैसे संभव है?
यह देने-लेनेकी बात समझना कठिन है। 
कृपया समझाइयेगा। 
सविनय,
साधक

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Everything is God's. You are God's. If you accept that, then you have already offered everything to God. 

If you can't accept that you are God's and have sense of ownership towards objects, then Krishna says to offer objects to Him like patram, pusham, phalam, toyam ...

g a mittal

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in fact the nature of ones association with the prakruti is duality and in the state of duality there are two hence give and take is natural process . how ever when the give and take is motivated to develop relation with god, this illusion is destroyed gradually and one gets established in the existence of one and only one God ,thus all the doubts vanish.
with love ckkaul

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बड़े भैया, भावका ही तो अभाव है तभी बुद्धि इतनी उछलती है। 
भाव कैसे आये? बताइयेगा। 
सविनय,
साधक

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As all jeevas have freewill they are free to offer anything to god.
But since Krishna serves Gau, devta and Brahmins he accepts only patram, pushpam, phalam, toyam from his bhaktas/devotees.

Jeeva having freewill are offering even cooked food of all kinds including non-veg (in many religious practices).
But Krishna has categorically and unequivocally stated what he would accept/eat/drink.

regds,
rakesh

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In vast enormity of universe our activity is insignificant but even then cognized.  An insignificant blessing by His enormity works enormous upon us.

subhashtewari

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हरि ओम

है तो सब कुछ भगवान् का पर मान तो अपना आपने रखा है या नहीं ? ख़ैर , कभी साल- दो  साल के बच्चे पर ग़ौर करें ! वह अक्सर फ़र्श पर पड़ी चीज़ें उठाकर पिता को देता है - और पिता प्रसन्न हो जाता है ! अब घर भी पिता का, चीज़ भी पिता की, बच्चा भी पिता का, लेकिन बच्चे का जो भाव होता कोई चीज़ फ़र्श से उठाकर पिता को दे देना, वह भाव पिता को प्रसन्न कर देता है - है ना ? इसी तरह सब भगवान् का है, पर जो भक्त का भाव होता है ना, वह भगवान् को प्रसन्न कर देता है । 

सविनयजी महाराज - आप कोरा माथा लगाते हैं, इसकी बजाय आप भावों पर जाइये - बुद्धि से आप कहीं नहीं पहुँचेंगे - भाव से पहुँचेंगे । 

जय श्री कृष्णा

व्यास एन बी



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Shree Hari


Ram Ram 

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