Tuesday, November 24, 2015

[gita-talk] मनुष्ययोनि साधनयोनि है, कर्मयोनि नहीं।

 



Shree Hari 



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25 अक्टूबर 2015 के सन्देशमें कहा है : मनुष्ययोनि साधनके लिये ही मिली है। यह साधनयोनि है, कर्मयोनि नहीं। 
जबकि गीता मनुष्यको कर्म करनेका ही अधिकार होनेकी बात कहती है। 
वैसे भी एक 'चुप साधन' को छोड़ दें तो अन्य सभी साधन कुछ न कुछ करनेसे ही सम्बद्ध हैं।  
क्या यहाँ भी कोई मुद्रण-त्रुटि हुई है? मनुष्ययोनिको 'कर्मयोनि नहीं' क्यों बताया गया है?
सविनय,
साधक

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हरि शरणम् !
कर्मप्रधान मनुष्य-योनि को कर्म-योनि कहा जा सकता है और सामान्यतया कहा भी जाता है | चूकि कोई भी कर्म बिना उद्देश्य / साध्य  का नहीं होता है, इसलिये उद्देश्य / साध्य  की प्रधानता को देखते हुए इसे साधन-योनि कहना ही बेहतर होगा | 

बडे भाग्य मानुष तन पावा | सुर दुर्लभ सब ग्रन्थनि गावा ||
साधन धाम मोक्ष कर द्वारा | पाइ न जेहि परलोक संवारा ||
सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ | 
कालहि कर्महि ईश्वरहि मिथ्या दोष लगाइ || (मानस / उत्तर काण्ड / 43)

नर तन सम नहिं कवनिउ देही | जीव चराचर जाचत तेही ||
नरक स्वर्ग अपवर्ग निसेनी | ज्ञान विराग भगति शुभ देनी || (मानस / उत्तर काण्ड / 121 /.. )

सप्रेम !
नीतीश दूबे

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IMPORTANCE OF SATSANG  -   please listen 

Ram Ram 


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Posted by: Sadhak <sadhak_insight@yahoo.com>
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