Saturday, November 7, 2015

[gita-talk] मेरी आत्मा तेरी आत् मा इसकी आत्मा उसकी आत् मा

 

Shree Hari   Ram Ram 

This brings closure to this thread.   Thank you every one !   

Gita Talk Moderators,   Ram Ram 

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कहा है : भगवान् कहते हैं कि मैं ही सबका आत्मा हूँ'अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।'
परमात्मा तो एक ही थे, एक ही हैं, एक ही रहेंगे जो सबका आत्मा हैं फिर यह मेरी आत्मा, तेरी आत्मा, इसकी आत्मा, उसकी आत्मा क्या है? मानो जितने प्राणी हैं उतनी ही आत्मा हैं। वस्तुत: कितनी आत्मा हैं? आत्मा एक है या अनेक?
कृपया समझाइये। 
सविनय,
साधक 

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Hari SharaNam, 
Saint Tulasidaas has beautifully explained that the same Supreme reflects his form / formless knowledge according to our vision.

जाकी रही भावना जैसी ! प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी !!
विदुषन्ह प्रभु विराटमय दीसा ! बहु मुख कर पग लोचन सीसा !!
जोगिन्ह परम तत्त्वमय भासा ! सांत शुद्ध सम सहज प्रकासा  !!हरिभगतन्ह देखे दोउभ्राता ! इष्टदेव इव सबसुख दाता !!
                              ( मानस / बालकाण्ड / 241-242/.. )

May All be blessed!
Niteesh Dubey

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>> कृपया यह और बता दें कि श्री कृष्णावतार से पूर्व भी क्या कृष्ण थे? 

Gita 2/12 --> na tv evāhaṁ jātu nāsaṁ na tvaṁ neme janādhipāḥ na caiva na bhaviṣyāmaḥ sarve vayam ataḥ param

There was never a time when you or Krishna (Paramatma) never existed. Yes, Krishna (Parmatma) is always present. 

मेरी आत्मा, तेरी आत्मा, इसकी आत्मा, उसकी आत्मा --> is illusion (bhrama).
When illusion goes away, then only Paramatma remains.

g a mittal

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आदरणीय श्री S. Vaidyanathan जी!
कृपया यह और बता दें कि श्री कृष्णावतार से पूर्व भी क्या कृष्ण थे? 
यदि पहलेसे ही विद्यमान थे तो कृष्णावतार की क्या आवश्यकता थी?


सविनय,
साधक

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आत्मा एक ही है, सकल विश्वमें व्याप्त है।
अजो नित्य: शाश्वतोङयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे   २/२०
इस श्लोकमें आत्माको अयं एक वचनसे दर्शाया गया है - यानि आत्मा एक ही है

अच्छेद्योङयमदाह्योङयमक्लेद्योङशाोष्य एव च
नित्य: सर्वगत: स्थाणुरचलोङयं सनातन:   २/२४

इस श्लोकमें भी उसे नित्य: - eternal, सर्वगत: - all pervading  स्थाणु: - stable, अचल - unmovable  एवं सनातन: - ancient बताया है। ये सारे गुण एकवचनी आत्माके बताये हैं। 

अात्मा एक ही है, शरीर अलग अलग है, मेरा शरीर, तेरा शरीर, उसका शरीर कह सकते हैं लेकिन आत्मा सबकी एक ही है परस्पर जुडी हुई है। 

जय श्रीकृष्ण   
bhaskar_joshi 

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Respected Sadhaks,

Because this topic has appeared as i do not that coversant in Hindi I could deduce this topic only after seeing the englsh writing of this topic.  Kindly include my views also in this topic.

Hare Krishna,

The recent development in me is that I feel that the hierarchy of GOD is totally flat.  That our paramathma LORD KRISHNA IS THE ONLY GOD.   Others are only his servants that includes demi-Gods and human beings.  Our God-head Lord is beyond religion and casts.  By virtue of HIM being made of soul he is available to his devotee anywhere and at anytime and in any place.  We have read that expanding universe.   The entire Universe is HIM.  By virtue of HE being made of Soul the Universe is keep expanding

with namaskaram

S.vaidyanathan

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  • Respected Sadhaks,

    Because this topic has appeared as i do not that coversant in Hindi I could deduce this topic only after seeing the englsh writing of this topic.  Kindly include my views also in this topic.

    Hare Krishna,

    The recent development in me is that I feel that the hierarchy of GOD is totally flat.  That our paramathma LORD KRISHNA IS THE ONLY GOD.   Others are only his servants that includes demi-Gods and human beings.  Our God-head Lord is beyond religion and casts.  By virtue of HIM being made of soul he is available to his devotee anywhere and at anytime and in any place.  We have read that expanding universe.   The entire Universe is HIM.  By virtue of HE being made of Soul the Universe is keep expanding

    with namaskaram

    S.vaidyanathan


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ॐ शान्ति।
शब्दों के परे जाकरके, निजी अनुभव के आधार से यह तो स्पष्ट है कि मैँ एक आत्मा हूँ, अपने शारीर से भिन्न हूँ। मैं आत्मा, अपने शारीर और इन्द्रियों का मालिक हूँ। मेरे कर्मों अनुसार ही मुझ आत्मा की गति है। मुझ आत्मा में परमपिता परमात्मा द्वारा दिए गए ज्ञान का अंश है। परमात्म ज्ञान की धारणा, अनुसरण-आचरण के पुरुषार्थ से ही मेरा अस्तित्व और व्यक्तित्व है।
ठीक इसी तरह ही, और सभी आत्मा भाइयों का भी निजी अस्तित्व है। कोई भी दो आत्मा एक-दूजे जैसी नहीं हो सकती। सहोदर जुड़वाँ भी भिन्न होतें हैं।
परमात्मा हम सब भिन्न आत्माओं के परमपिता हैं। हमारे पारलौकिक पिता हैं, धर्म, राष्ट्र, इत्यादि भिन्नता के परे। शिव बाबा हम सब आत्माओं के पिता हैं - सर्वशक्तिवान, पतित पावन, ज्ञान का, प्रेम का, पवित्रता का, शान्ति का, सुख-आनंद का सागर है।
शुभकामना। ॐ शान्ति ।
jhun sanjay




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श्री jhun sanjay जी!
जब परमात्मा एक है जो सबका आत्मा है तो आत्मा (जो एकमात्र परमात्मा है) अनेक हो ही कैसे सकती हैं? आत्मायें अनेक हैं, आपके इस कथनका शास्त्रीय प्रमाण (या आधुनिक वैज्ञानिक evidence) क्या है? कृपया अपने कथनका आधार (शास्त्रीय या आधुनिक विज्ञान के अनुसार) स्पष्ट कीजियेगा। 
श्री भास्कर जोशीजी!
गीता 2 : 20 और 2 : 24 के अनुसार आत्मा एक है। इसका प्रतिवाद किया ही नहीं जा सकता। 
आपने जो कहा है कि ''शरीर अलग-अलग हैं, मेरा शरीर, तेरा शरीर, उसका शरीर कह सकते हैं'', इसमें यह स्पष्ट नहीं होता कि ''मेरा शरीर'' कहनेवाला कौन है? ''तेरा शरीर'' कहनेवाला कौन है? ''उसका शरीर'' कहनेवाला कौन है? कृपया स्पष्ट कीजियेगा ताकि रही-सही गुत्थी सुलझ सके। 


सविनय, 
साधक 

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परमात्मा एक, आत्माएं अनेक हैं। परमात्मा हम आत्माओं के पारलौकिक पिता हैं। परमात्मा ही सतगुरु हैं। शिव परमात्मा है ~ अजन्मा, पतित पावन,  सर्वशक्तिवान, सर्वज्ञता, सुख करता दुःख हरता, मंगल करता हैं।
शुभकामना, ॐ शान्ति

jhun sanjay

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आत्मा एक ही है, सकल विश्वमें व्याप्त है।
अजो नित्य: शाश्वतोङयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे   २/२०
इस श्लोकमें आत्माको अयं एक वचनसे दर्शाया गया है - यानि आत्मा एक ही है

अच्छेद्योङयमदाह्योङयमक्लेद्योङशाोष्य एव च
नित्य: सर्वगत: स्थाणुरचलोङयं सनातन:   २/२४

इस श्लोकमें भी उसे नित्य: - eternal, सर्वगत: - all pervading  स्थाणु: - stable, अचल - unmovable  एवं सनातन: - ancient बताया है। ये सारे गुण एकवचनी आत्माके बताये हैं। 

अात्मा एक ही है, शरीर अलग अलग है, मेरा शरीर, तेरा शरीर, उसका शरीर कह सकते हैं लेकिन आत्मा सबकी एक ही है परस्पर जुडी हुई है। 

जय श्रीकृष्ण   

bhaskar_joshi 

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 Dear Sadhakjee,
            It is correct that Bhagavaan is ONE. His आत्मा is परमात्मा. All the entities in the Universe have within them, जीवात्मा. जीवात्मा is अंश of परमात्मा. That is why every entity has some Divinity in the form of this अंश.
           With regards,
           ------Mukund Apte   



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Shree Hari   Ram Ram  

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Posted by: Sadhak <sadhak_insight@yahoo.com>
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