Thursday, November 19, 2015

[gita-talk] What does Gita say about Murti Puja ?

 




गीतामें इस बारेमें क्या बताया है?
जब कभी किसी मंदिरमें नयी मूर्ति रखी जाती है तो मूर्तिमें विधि-विधानसे 
प्राण-प्रतिष्ठा करनेके बाद ही उस मूर्तिकी पूजा की जाती है। 
हर वर्ष दीपावलीपर बाजारसे नयी बनी लक्ष्मी गणेश की मूर्तियाँ लाकर (उन 
मूर्तियोंमें विधि-विधानसे प्राण-प्रतिष्ठा किये बिना ही) पूजा करते हैं। 
मूर्तियोंकी पूजा करनेमें यह भिन्नता क्यों है? 
गीतामें मूर्तिकी पूजा करनेके लिये क्या नियम बताये हैं?
समझाइयेगा। 
सविनय,
साधक

What has Gita said about this
When ever a new deity is installed at the temple,  certain rituals and rites are performed for 'Pran Pratishtha' (invoking God into the deity), and there after puja etc is done.   Every year at Diwali,  new deities are purchased from the market of Lakshmi - Ganeshji and (without pran-pratishtha,  rituals etc) one prays to them.   Why the differences in the way the deities are worshipped ?    What has Gita said about Murti puja and what methods - restrictions etc.  are shown ? 

Please share,  Humbly,  Sadhak

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हरि शरणम!
भगवद्गीता का मुख्य विषय श्रेय / कल्याण प्राप्ति है ! यदि आपका प्रश्न यह है कि भगवद्गीता में  मूर्ति पूजा के द्वारा कल्याण प्राप्ति का विधान क्या है ? तो इसका  उत्तर है कि उस मूर्ति में देवता की भावना नहीं बल्कि भगवद्भावना करके जो भी पदार्थ, कर्म, कर्म-फल इत्यादि साधक से सम्बंधित हो , भगवान को निष्काम-भक्तिपूर्वक अर्पण करते हुए जीवन व्यतीत करे ( गीता - 9/23-28) ! यहां पर हमें ध्यान देना होगा कि इस विधि में 'भगवद्भावना' और 'निष्काम भक्ति' की ही प्रधानता है !

अगर मूर्ति पूजा का उद्देश्य 'श्रेय' न होकर कोई 'प्रेय' हो तो, उससे सम्बंधित शास्त्र का अवलोकन करना चाहिए !

सप्रेम !
नीतीश दूबे

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स्वामीजीके लेख 'मूर्तिपूजा' [साधन-सुधा-सिंधु पृष्ठ 349 से 356 तक] में कहा है : जो मूर्ति, वेद, सूर्य आदिमें भगवान् को मानते हैं, वे स्वत: सब जगह, सब प्राणियोंमें भगवान् को मानने लग जायेंगे।
वास्तविकता कुछ और ही है। बहुत वर्षों तक मूर्तिमें भगवान् को माननेवाले मंदिरके बाहर धरतीपर बैठे 
'दरिद्र नारायण' को 'भगवान' नहीं 'भिखारी' ही मानते हैं और उसी भावसे उन्हें जो कुछ भी देते है, उसे भिक्षा समझकर ही देते हैं। साधकने कइयोंसे पूछा भी कि इन्हें क्यों दिया तो बोले,''ये भिक्षुक हैं, भीख मांगनेके लिये बैठे हैं, इसलिये इन्हें दिया।'' किसी भी मंदिरके बाहर इस बातको सत्यापित कर सकते हैं।
संत-हृदय स्वामीजीने ऐसा क्यों लिखा कि वे स्वत: सब जगह, सब प्राणियोंमें भगवान् को मानने लग जायेंगे।, साधक समझ नहीं सका है। 
सविनय,
साधक

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Shree Hari  Ram Ram 

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Published in July 2010 

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