Tuesday, November 17, 2015

[gita-talk] Seeking Clarification on contradictions in Gita

 

||   Shree Hari   ||

THIS BRINGS CLOSURE TO THIS TOPIC.   Please read Swamiji's response below.  

THANK  YOU,   RAM RAM 

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RAMCHARITMANAS 9 day PARAYANA in  Shree Ram Seva Ashram in VRINDAVAN

From Sunday 29th November,  2015,     Ending   Monday  7th December,  2015  
Daily at NOON

Ram Ram

।।ॐ श्री परमात्मने नमः।।
मान्यवर,
परमपिता परमेश्वर की असीम कृपा से श्रीराम सेवा आश्रम, वृन्दावन में, विश्व शांति के उद्देश्य से-
सिंहस्थल पीठाधीश्वर परमपूज्य
श्री श्री १००८ श्री क्षमारामजी महाराज के श्रीमुख से
श्रीरामचरितमानस के संगीतमय नवाह्न परायण का आयोजन होने जा रहा है।
इस शुभ अवसर पर अन्य संत-महात्माओं एवं आचार्यों ने भी कृपा पूर्वक पधारने की स्वीकृति प्रदान की है।
आपसे अनुरोध है की सगे-संबंधियों एवं मित्रों सहित पधारकर इस दुर्लभ अवसर का लाभ उठाएं।
रविवार दिनांक २९.११.१५ से सोमवार दिनांक ७.१२.१५ तक, प्रतिदिन दोपहर १२ बजेसे
निवेदक-
साधू नवलराम शास्त्री🙏

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Gita Workshop - 2015, Rishikesh

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मैं अज (अजन्मा) रहता हुआ ही जन्म लेता हूँ प्राणियोंका ईश्वर (मालिक) रहता हुआ ही दास बन जाता हूँ और अव्ययात्मा रहता हुआ ही अन्तर्धान हो जाता हूँ (४ । ६), तो अजका जन्म कैसे ? मालिकका दास होना कैसे ? और अव्ययात्माका अन्तर्धान होना कैसे ?

English 


Though being birthless, yet I am born;   though being the Lord of all,  yet I become their servant;  though being imperishable,  yet I disappear (Gita 4/6).   How so  ?  


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Swamiji's response in Gita Darpan -


This is all the Lord's Divine sport.   In spite of taking birth,  He remains eternally birthless,  rather it remains so permanently.  God also becomes the servant of His devotees,  yet,  His Lordship never goes away.   Whosoever's servant He becomes,  His reign over them too,  remains as it is.    Similarly,   He disappears in spite of being imperishable,  in order to enhance the love and devotion of His devotees.  So, it means, that this is all part of the Divine Loving sport and pass-time of the Lord.  Therefore there is nothing contradictory or surprising in His Divine Sport. 

HINDI


यह तो भगवान्‌की लीला है । जन्म लेते हुए भी भगवान्‌का अजपना मिटता नहीं, प्रस्तुत अखण्डित ही रहता है । भगवान् भक्तोंके दास भी बन जाते हैं, पर उनका ईश्वरपना मिटता नहीं । भगवान् जिनके दास बनते है, उनपर भी भगवान्‌का शासन ज्यों-का-त्यों ही रहता है । ऐसे ही अव्ययात्मा रहते हुए ही भगवान् अन्तर्धानकी लीला करते हैं; भक्तोंका प्रेम बढ़ानेके लिये छिप जाते हैं । तात्पर्य है कि यह सब लीलापुरुषोत्तमकी लीला है; अतः इसमें कोई विरोध या आश्चर्य नहीं है ।

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जिस तरह तेज चलती ट्रेनमें बैठे होनेपर पटरीके पास वाले पेड़ (जो चलते ही नहीं कभी) तेजीसे पीछे 
भागते दिखायी देते हैं उसी तरह अजन्मा जन्म लेता हुआ, सबका स्वामी दास बना हुआ और अव्यात्मा अन्तर्धान होता दिखायी देता है। 
सविनय,
साधक

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ENGLISH  :   www.swamiramsukhdasji.net  
HINDI :    www.swamiramsukhdasji.org   


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Posted by: Sadhak <sadhak_insight@yahoo.com>
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