Sunday, November 1, 2015

[gita-talk] Aarti - Om Jagdish Hare, is filled with 'wants - desires' for fruit. yet, chanted at every spiritual event. Please share source !

 

साधक - संजीवनीके पृष्ठ 1217 पर कहा है : जहाँ कुछ भी चाहना हो जाय, वहाँ प्रेम कैसा? वहाँ तो आसक्ति, वासना, मोह, ममता ही होते हैं। 
यह जो 'ॐ जय जगदीश हरे' प्रार्थना (या आरती) है, उसमें तो चाहना ही चाहना (फल पावे, दुःख बिनसे मनका, सुख-संपत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तनका, कृपा करो, अपने हाथ उठाओ, अपनी शरण लगाओ, विषय-विकार मिटाओ, श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ) भरी हुई है। 
ॐ जय जगदीश हरे प्रार्थनाके अन्तमें यह भी कहा जाता है : कहत शिवानंद स्वामी फल वांछित पावे। (इसमें फलकी कामना स्पष्ट है)। 
फिर भी इसे कीर्तन-भजन-कथा-वार्ता आदिके अंतमें कहा जाता है। 
जिन किन्हीं शिवानंद स्वामीने इस प्रार्थनाकी रचना की है, उस ग्रन्थ (या रचित पुस्तक) का परिचय देनेकी कृपा करें। 
सविनय,
साधक  

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Gita Talk Moderators,  Ram Ram

ONLY GOD IS MINE    (from For Salvation of Mankind by Swami Ramsukhdasji)







 






 
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Posted by: Sadhak <sadhak_insight@yahoo.com>
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