Saturday, October 24, 2015

[gita-talk] Understanding of Gita Chapter 2/16

 


गीता 2 : 16 के संदर्भमे ं समझना है

साधक-संजीवनीके पृष्ठ 67 पर लिखा है : जब तक असत् की सत्ता है, तब तक विवेक है। 
साधक-संजीवनीके पृष्ठ 64 पर लिखा है : असत् की सत्ता नहीं है। 
असत् की सत्ता नहीं होने (पृष्ठ 64) पर भी जब तक असत् की सत्ता है, तब तक विवेक है (पृष्ठ 67) कहना अवश्य कुछ गूढ़ बात है। 
उसमें निहित गूढ़ताको समझानेकी कृपा करें। 
सविनय,
साधक 
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  • हरि ओम

    सविनयजी महाराज ! गूढता  मात्र  इतनी है कि असत् की सत्ता वास्तवमें है नहीं पर आपने "मान रखी" है ! अब कोई चीज़ है नहीं पर आपने मान ली तो हो गई , बिना वास्तवमें होते हुए भी हो गयी - क्योंकि आप सत्य-संकल्प है, जो धारणा बना लेंगे वह नहीं होते हुए भी आपका अनुभव बन जायेगी ! अत: जब तक असत् की सत्ता आपने "मान रखी है" ( जैसे रस्सी को साँप मान लेते हैं) तब तक "विवेक" की ज़रूरत है ! जहाँ आपने असत् की सत्ता को माना ही नहीं - वहाँ विवेक समाप्त हो जायेगा और तत्व ज्ञान में परिणत हो जायगा ! जब असत् है ही नहीं तो फिर विवेक क्या करेगा ? विवेक वहाँ काम आता है जहाँ दूसरी सत्ता हो - जहाँ "संख्या" ( सांख्य योग) हो - जहाँ सत् ही सत् हो वहाँ विवेक का कोई काम नहीं रहता ।

    जय श्री कृष्णा

    व्यास एन बी

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हरि शरणम!
आदरणीय साधक जी, विवेक के बारे में पृष्ठ संख्या 869 और 871 पर भी ध्यान देना चाहिए जहां यह लिखा हुआ है की "विवेक भी अनादि है " ! इसके बाद गूढता का प्रश्न होना चाहिए था ! लेकिन , पूज्य स्वामीजी पृष्ठ संख्या 871 पर ही इसका ज्ञान और भक्ति के दृष्टि में दे रखे हैं !
नीतीश दूबे



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