Tuesday, September 1, 2015

[gita-talk] प्रश्न नहीं, अनुरोध है यह

 



स्वामीजीका प्रत्येक कथन मार्मिक होता है और स्वामीजीका बताया प्रत्येक उपाय (विध्यात्मक या निषेधात्मक, दोनों) अचूक होता है। 
उनका एक निर्देश है : करनेमें सावधानी और होनेमें प्रसन्नता। 
साधक सम्प्रति इसके पूर्वार्ध अर्थात ''करनेमें सावधानी'' से क्या समझा, उसे गीता-वार्तामें सभी साधकोंसे share करना चाहता है। 
''करनेमें सावधानी'' से साधक यह समझा कि क्रिया चाहे कोई भी हो, उसमें ''मैं कर रहा/रही हूँ'' की भावना नहीं की जाय। 
सभी सुहृद साधक दया करके बतानेकी कृपा करें कि ''करनेमें सावधानी'' से उन्होंने क्या-क्या समझा? कौनसी सावधानी सर्वोच्च प्राथमिकतापर रखी? 
सविनय,
साधक 

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It could mean  -  We must diligently do 'purshaarth'  (sincere effort), as we have the power 'to do'.   We must put forth total effort and abilities in doing,  renouncing pride of doership and desire for fruit.     But we have no power in the outcome,  which is dependent on 'praarabdh' (caused by fate / destiny) -  we must remain 'prasanna'.   We must trust that whatever is destined for us, is planned and due to us,  and that alone we shall receive,  and remaining happy in that alone.   

Bala GK 

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भैया GA Mittal जी!
पहले 'करनेमें सावधानी' को समझने लगा। 'होनेमें प्रसन्नता' को बहुत पहले ही समझ लिया था कि जब उसकी ही मरजी होती है तो चाहे प्रसन्न होवो चाहे रोवो, जो होना है सो होगा ही, हमारे दुखी होने या प्रसन्न होनेसे कोई अंतर नहीं पड़ेगा इसलिये रोकर (दुखी होकर) क्यों व्यर्थ आँखें फोड़ो? एक ही विकल्प बचा कि जो भी होवे, उसमें प्रसन्न रहो। 
आपने जो स्वामीजीका मूलमंत्र समझनेको कहा है, उसे मन-बुद्धिसे माननेसे तो कुछ हुआ नहीं और स्वयंसे मानना अभी आया नहीं तभी तो यह प्रश्न पूछनेकी जरूरत आ पड़ी। 
साधक मानता है कि जिसने स्वामीजीका मूलमंत्र [मैं भगवानका हूँ और केवल भगवान ही मेरे हैं] सिद्ध कर लिया उसके पास न कोई प्रश्न होगा और न ही उसे किसीसे उत्तर पानेकी जरूरत होगी, वह जिसका है और जो उसका है दोनों परस्पर (एक-दूसरेसे) सारी समस्यायें सुलट लेंगे। 
अस्तु। 
सविनय,
साधक  

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स्वामीजी ने "होनेमें प्रसन्नता" को महत्व ज्यादा दिया है । चिंता दीनदयाल को मन सदा आनंद । उनका करणनिरपेक्ष साधन है । क्या आपने "होनेमें प्रसन्नता" को समझ लिया है?

"मैं भगवान का हूं और भगवान मेरे है " - इसको आप समझ लो । करने में सावधानी को मतलब है की "मैं भगवान का हूं और भगवान मेरे है " मानकर करना ।

g a mittal

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HINDI:            http://www.swamiramsukhdasji.org


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Posted by: Sadhak <sadhak_insight@yahoo.com>
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