Saturday, September 26, 2015

[gita-talk] सुधार शुरू कैसे हो ?

 

  • स्वामीजी के प्रवचन में से सुना था कि जब तक अपने मान,बढ़ाई,आदर की इच्छा समाप्त, कम नहीं होगी तब तक अपने लक्ष्य की तरफ चलना शुरू नहीं होगा। सुनने पर लगा कि जैसे मेरे बारे में ही बोला है। यह प्रवचन पहले भी सुनने को मिला था, सुनते समय तो ऐसा भाव आ जाता है कि अब बदलाव् आना चाहिए लेकिन रोज़ाना के जीवन में - यह  सुना है ऐसा याद भी नहीं आता है। स्वामी जी ने कहा था कि न हो पाये तो भगवान को पुकारो तो वे अवश्य सुनेंगे और रास्ता, हल आदि निकालेंगे लेकिन मेरे मन में तो यह आता है कि 'मान बढाई की भूख मुझे नहीं हो' यह याद ही किसे रहता है, जो अपने को असमर्थ समझ/जान कर पुकार करे?  मेरी प्रार्थना है कि अभी याद है इसलिए  वह तरीका जान लूं जिससे मान बढ़ाई की इच्छा न होवे। प्रार्थना है कि प्रबुद्ध एवं अनुभवी साधक बताने की कृपा करें।। ...... मनमोहन बत्रा
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मनमोहन भैया, 
मान-बढ़ाईकी इच्छा साधकके मनमें बैठी थी और अभी भी बैठी है (अकेलेमें अंदर झाँकनेपर साफ नजर आ जाती है) किन्तु साधकको उससे परेशानी नहीं होती। स्वामीजीका बताया मन्त्र (मनको अपना मत मानो) अद्भुत काम करता  है। जो अपना नहीं, उसकी और उसमें बैठी इच्छाकी उपेक्षा स्वत: हो जाती 
है। साधक जिस इच्छाकी निवृत्ति नहीं कर पाता, उस इच्छाकी उपेक्षा करके उससे अलग हो जाता है।
सविनय,
साधक  

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You want praise, respect etc because you think that you are body and its associated objects.

For example, some praise you as handsome. You become happy. Why? Because you think that you are body and become happy when your body is praised. Someone praises your achievements. Again you think that those achievements associated with body and mind are yours and become elated. Now, someone disrespects your body, mind or intelligence. You become upset.

Main problem is that you have accepted you and yours as body and its objects. Until you will accept you as body (including mind) and yours as bodily senses and objects, you won't move towards truth because your basis of movement is wrong.

There is nothing wrong in praise, respect etc. Problem is that you have accepted illusion as truth. So, accept that you are part of God and only God is yours. You are not part of the world and world is not yours.

Lead life on this acceptance, love and respect all people and everything else will follow.

If you have Bhagavatam, read the story of Titikshu Brahmana in Udhava Gita (11/23). That just changed my understand. Swamiji's teachings coupled with Bhagavatam 11/23 will make you understand this concept quite well.

g a mittal


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Posted by: Sadhak <sadhak_insight@yahoo.com>
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