Saturday, September 19, 2015

[gita-talk] परमात्माके मिलनेकी लगन है या कुछ और ही चल र हा है?

 



This brings closure to this topic.   Ram Ram  

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परमात्माके मिलनेकी लगन है या कुछ और ही चल र हा है?

परमात्माके मिल जानेके अतिरिक्त, परमात्माके मिलनेकी लगन होनेको कैसे पहचाने?
यह कैसे पहचानें कि अब वास्तविक लगन हुई है या कुछ और चल रहा है?
कृपया उदाहरण सहित समझायें। 
इसे जानना इसलिये आवश्यक है कि कहीं कुछ और में ही जीवन न चला जाय, जैसा 
कि अभी तक गया है अन्यथा यह प्रश्न पूछा ही नहीं गया होता। 
सविनय,
साधक 

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Shree Hari  Ram Ram 

Just like he who is thirsty within, only sees water.  If he is not thirsty, than even if the water is in front of his eyes, it will not be seen.  Similarly, he who has thirst, longing, desire, craving  (laalasa, lagan) for Paramatmaa, they see only Paramatmaa, whereas he who has thirst for the world, he sees the world.  When there is thirst for Paramaatmaa, then thirst for world vanishes, disappears, becomes non-existent (lupt) and when there is thirst for the world,  Paramaatmaa vanishes, disappears, becomes non-existent (lupt).  The point is, on having thirst for the world, though there being no world, only an illusion, like a mirage in the desert,  the world is seen.  And on having 'LAGAN'  for Paramatmaa, though not physically seen, He is perceived.  When thirst for Paramaatmaa is awakened, then the sadhak does not think of past, nor does he have expectation in the future, and in the present, he feels restless without realizing Paramaatmaa.

Do you feel restless without realizing Paramatmaa ?  

Meera Das,  Ram Ram  

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Shri Hari 

Aap Swamiji ke Vishesh Pravachan  'VAASTAVIK LAGAN'  sun sakte hai -  


One of Swamiji's pravachans,    AISA LAGAN HAI AAP MEIN?  
Please listen -  

Gita Talk Moderators,   Ram Ram  

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  • Priya Sadak Ji,
                               Namaskaram!

    Hindhi mai jawab bilkul sahee diya hai! Abhee nahee too kabhi nahee! Maine bhee aap sae kahee bar kaha ki aap jise bhee Aap samajtae hai bus kewal vahee paratma hai. Phehla too manana hoga ki paratma AAP HEE HAI, phir jannae aur pahchane kaa rasta khud hee miljayega! Yedi is param satya ko nahee manogae too paratma milna kathin hoga........AHAM BRAMH ASMI sab say saral evam satya vachan hai!
    Narayana Narayana


    (Kuldeep Kumar Kaul)

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  • मानने में कितनी लगन की जरूरत है । "प्रभु की प्राप्ति साधना से नहीं, केवल मान्यता से है" में लिखा है - "यह प्रश्न उठता है की जब बात इतनी सगम है तो ठहरती क्यों नहि। इसका उत्तर है की आप इस बात को महत्व नहीं देते, आदर नहीं देते । यहा अभ्यासजन्य नहीं है । इसे या तो मान लो या जान लो । जैसे यह नेपाल है इसका आपने अभ्यास नहीं किया, केवल मान लिया की यह नेपाल है । आप मानने में स्वतन्त्र हैं ।"

    आपने लिखा - " कहीं कुछ और में ही जीवन न चला जाय, जैसा कि अभी तक गया है" । इसका उत्तर स्वामीजी देते हैं - "मानना चाहो तो अभी मान सकते हो और न मानना चाहो हो जन्म-जन्मान्तर तक भी नहीं मान सकोगे । "
    क्या मानना है? स्वामीजी - "मैं हुँ यह आत्मज्ञान है और परमात्मा है यह परमात्मज्ञान है । मैं और परमात्मा की एकता है और शरीर और हमारी कहलाने वाली की सामग्री की संसार के साथ एकता है । अतः यह अपनी कही जाने वाली वस्तुओ के द्वारा संसार की सेवा कर देना है और अपने आप को परमात्मा को देना है । बस इतनी ही बात है । "


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Dear Yahoo-Group-people,

Your Thinking will decide who you are going for either for God
or  your world. Your worldly thoughts are not going to God. 
You will need "Thinking Divine, 24/7" to remember God all
the time. There is no need to discuss anything otherwise you will
keep discussing it forever.

Thanks.   !
Notesav

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HINDI:            http://www.swamiramsukhdasji.org






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Posted by: Sadhak <sadhak_insight@yahoo.com>
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