Wednesday, September 9, 2015

[gita-talk] : I Still Feel the Body is Mine - Please Help !

 


In book -  For Salvation of Mankind,  pertaining to the question -  

What Should a Man do to Attain Salvation  ?   Swamiji says -  
A man should firmly accept that four facts,  and he will attain salvation -  

1.  Nothing is mine at all
2.  I need nothing at all
3.  I have not the least relationship with anyone
4.  God alone is mine.   

I am stuck on 1.   Nothing is mine at all.   Though I would like to firmly accept,  deeply I still feel  the body is mine.    Through vivek,  I can understand Swamiji's deliberations on this subject, but I can't shake of the link with the body.     Please help !  

A seeker of Truth !  

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आपके मानने में आये चाहे न आये, अनुभव हो चाहे न हो - इसकी चिंता मत करो; परन्तु इस बात को रद्दी मत करो।

(साधन सुधा सिंधु - सुगम साधन - भक्ति अध्याय ९ से)
परमात्मा अपने हैं - यह शास्त्र कहता है, और संसार अपना नहीं है - यह अनुभव कहता है। यह बात भले ही आप अभी न मान सको, भले ही आपसे मानी नहीं जा रही हो; परन्तु हिम्मत नहीं हारो। यह मत  सोचो की हम तो इस बात को मान नहीं सकते। भले ही हमारे मानने में न आ रही हो, पर वास्तव में 'में शरीर हूं , शरीर मेरा है' यह बात है नहीं - इस बात को स्थिर रखो। आपके मानने में आये चाहे न आये, अनुभव हो चाहे न हो - इसकी चिंता मत करो; परन्तु इस बात को रद्दी मत करो।

शरीर 'में' नहीं है और 'मेरा' नहीं है - यह बात सच्ची है एवं में भगवान का हूँ और भगवान मेरे हैं -  यह बात भी सच्ची है। सच्ची होने पर भी मानने में नहीं आती तो यह हमारी एक कमजोरी है। हमारे न मानने से सच्ची बात रद्दी (गलत) कैसे हो सकती है?

श्रोता - हम इस बात को रद्दी कैसे करते हैं?
स्वामीजी - इन्द्रियों के द्वारा, बुद्धि के द्वारा हम जिन वस्तुओ को देखते हैं, उनको सच्ची और अपनी मान लेते हैं; इससे यह बात रद्दी हो जाती है। उन वस्तुओ में अपनेपन का त्याग नहीं होता तो कोई बात नहीं; परन्तु 'शरीर संसार मेरे नहीं हैं' यह बात सच्ची है - इतना आदर तो आपको करना ही चाहिए! भगवान न दिखे तो न सही, पर 'भगवान हमारे हैं, हम भगवान के हैं' - यह बात सच्ची है।

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बंधुवर,
इतना कुछ (जो आपने भी पढ़ा है) पढ़ लेनेके बाद, मन-बुद्धिसे सब (चारों बातें ) मान लेनेके बाद भी कुछ नहीं हुआ था तो आपकी तरह साधक भी इसको अभी भी सहन कर रहा है।
बहुत तर्क-वितर्क और कुतर्क (बड़े भैया ने बताया कुछ तर्क असलमें कुतर्क ही हैं) चलते रहते हैं किन्तु सचमें होता-जाता कुछ नहीं। 
फिर सोचा कि अनेक (इस प्रकरणमें चार बातें) को पकड़ना नहीं हो रहा तो एक को ही पकड़ें तो जरूर काम बनेगा। स्वामीजीने कहा भी है - एकै साधे सब सधै अत: सम्प्रति पकड़ा है -सृष्टिमात्रमें कुछ भी अपना नहीं है। 
अब व्यवहार में (अभी तक सब सही चल रहा है) कोई पूछता है,''यह पुस्तक तुम्हारी है?'' तो उससे बोल देते हैं,''हाँ मेरी है।" क्योंकि यदि कहेंगे,''मेरी नहीं, संसारकी है।'' तो वह समझेगा नहीं। हाँ, मनमें अवश्य अनेक बार दोहरा लेते हैं,''मेरी नहीं, संसारकी है।'' अब यदि आप और अन्य साधक समझें कि यह तो स्वयंको और दूसरेको बुद्धू बनाना है तो समझा करें, अपने तो लग गये इस एक ही सूत्रको पकड़कर। 
पुस्तकका उदाहरण दिया है, सूत्र तो सभी पर लग रहा है, फिर वह शरीर हो, वस्तु हो, व्यक्ति हो, अवस्था हो या कुछ भी हो। अंदरमें बड़ा वैसा लग रहा जैसा पहले नहीं लगता था किन्तु सावधान भी हूँ कि चाहे कैसा भी लगे, यह लगना भी अपना नहीं है। बात खत्म। 
सविनय,
साधक  

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The body is mine. From advaita point of view the concept is explained in two stages 

1. When you say 'the body id mine'  there is impelled understanding that you are no the body as you are saying in a way 'my body'
 the body is an object to your 'I' awareness. which has no form and therefore not limited to the body.

Then what is body, and all other objects you see  in the world ? They are all inert and exist (sat). But the moment your chit( awareness) joins them, they also become awareness/consciousness. They do not have independent existence. They do not exist independently without chit joining them. Thus you and body both are .nothing but Brahman( Awareness/Consciousness or whatever you call)

Regarding point 4. Where is God apart from infinite Awareness?

r podury

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According to my sadhana, one cannot shake the link with the body as it is through this body we need to get out of shackles of karma. Then a different understanding of the body? That helps. May be you can focus on where do this 'I like to..."  and "I still feeling..."  emanate from! Tos begin with. 

Thank you
Veena

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Hello,

  • Yes, you will feel that because all you have are "physical thoughts". "Thinking divine, 24/7" 
    will change that--- if you want. This prayer will may take you to "Nirvana". It is taking me
    there.

    Thanks. Bye!
Notesav

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HINDI:   www.swamiramsukhdasji.org     





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Posted by: Sadhak <sadhak_insight@yahoo.com>
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