Wednesday, September 9, 2015

[gita-talk] Fw: प्रश्न नहीं, अनुरोध है यह

 

Shree Hari 
Ram Ram 

This brings closure to this thread.   Thank you all !   
Ram Ram 

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स्वामीजीका प्रत्येक कथन मार्मिक होता है और स्वामीजीका बताया प्रत्येक उपाय (विध्यात्मक या निषेधात्मक, दोनों) अचूक होता है। 
उनका एक निर्देश है : करनेमें सावधानी और होनेमें प्रसन्नता। 
साधक सम्प्रति इसके पूर्वार्ध अर्थात ''करनेमें सावधानी'' से क्या समझा, उसे गीता-वार्तामें सभी साधकोंसे share करना चाहता है। 
''करनेमें सावधानी'' से साधक यह समझा कि क्रिया चाहे कोई भी हो, उसमें ''मैं कर रहा/रही हूँ'' की भावना नहीं की जाय। 
सभी सुहृद साधक दया करके बतानेकी कृपा करें कि ''करनेमें सावधानी'' से उन्होंने क्या-क्या समझा? कौनसी सावधानी सर्वोच्च प्राथमिकतापर रखी? 
सविनय,
साधक 

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भैया GA Mittal जी!
'करनेमें सावधानी' का मतलब है,'मैं भगवानका हूँ और भगवान ही मेरे हैं।' मानकर चलना। 
बहुत - बहुत धन्यवाद इतना मात्र बतानेके लिये। बात ही खत्म हो गयी। 
श्री गीता-वार्ता समन्वयक महोदय कृपया इस वार्ता-सूत्रका समापन करनेकी कृपा करें। 
सविनय,
साधक 

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साधक >>> उसे मन-बुद्धिसे माननेसे तो कुछ हुआ नहीं और स्वयंसे मानना अभी आया नहीं तभी तो यह प्रश्न पूछनेकी जरूरत आ पड़ी।

(प्रभु की प्राप्ति साधना से नहीं, केवल मान्यता से है) - मैं हुँ यह आत्मज्ञान है और परमात्मा है यह परमात्मज्ञान है । मैं और परमात्मा की एकता है और शरीर और हमारी कहलाने वाली की सामग्री की संसार के साथ एकता है । अतः यह अपनी कही जाने वाली वस्तुओ के द्वारा संसार की सेवा कर देना है और अपने आप को परमात्मा को देना है । बस इतनी ही बात है ।
यह प्रश्न उठता है की जब बात इतनी सुगम है तो ठहरती क्यों नहि। इसका उत्तर है की आप इस बात को महत्व नहीं देते, आदर नहीं देते । यह अभ्यासजन्य नहीं है । इसे या तो मान लो या जान लो । जैसे यह नेपाल है इसका आपने अभ्यास नहीं किया, केवल मान लिया की यह नेपाल है । आप मानने में स्वतन्त्र हैं  । मानना चाहो तो अभी मान सकते हो और न मानना चाहो हो जन्म-जन्मान्तर तक भी नहीं मान सकोगे ।

कृपया  स्वामीजी के शब्दों की ध्यान से पढ़े । क्या नेपाल मानने में ज्ञान की जरूरत है । मैं कभी नेपाल नहीं गया । तो भी मैं नेपाल देश को सत्य मानता हूँ । ऐसे ही मैंने मेरा नाम मान लिया है । इसमें कोई ज्ञान की जरूरत नहीं है । उसी प्रकार मान लो है की में भगवान को हूँ यह परम सत्य है  । उसके बाद भगवान जैसे रखे और जो ज्ञान दे उसमें संतुष्ट और खुश रहो । भगवान सबमें हैं । इसलिए सबसे प्रेम रखो और सबको अच्छा सोचो। त्वदीय वस्तु गोविंदं तुभ्यमेव समर्पये । इसप्रकार मैं भगवान को हूँ और भगवान सबमें है मानकर कर्म करना करने में सावधानी है।

g a mittal

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Dear ALL, Sadak in particular,
                                       Namaskar!
Unfortunately, majority of Bhagvedgita scholars have misinterpreted Lord Krisha verse: 
"KARMANE VAADIKARASTE MAFLASHU KADACHAN,                                                            MAKARM FALHE TURBH MATOSANGOSTI VIKARMANI!"

Let me try to talk & take the help of pure logic! it is logical and easy to understand & agree that without desire of AIM (Fal or Fruit)   no action can be possible! Unless, I develop a desire to eat food (FAL) then why the hell, I would go to kitchen and start cooking food??? Lord Krishna 16 Kala Sidha person could never have  said such a illogical proposition!!!!

Let me now explain what Lord Krishna must actually have said in the above mentioned verse:
Think & desire a proper AIM (FAL) which, definitely must not be at the cost of others comfort ! Then take all the precautions, proper means, best environment, tools, support and the like so that you are cent percent sure to be successful to achieve that prefixed AIM say Eating Food! But, due to destiny (Prarabhda) if food after nicely cooking falls down or, is eaten by cat or dog so that you got deprived of the food made with all the care then, you should not disheartened for two reasons. One, if you get disheartened then you would not try again so as to loose the chance of getting food permanently and two, eating food in first attempt (FAL) was not in your hands but, action of cooking only was!
So answer to dear Sadak is that Lord Krishna asks Him to Fix the proper AIM, take all type of precautions (Pursharatha) so that prefixed AIM is surely achieved but He should never get disheartened if there is a failure after taking all the possible precautions so that  He can try again and again and more over He should also keep in mind that achieving AIM (FAL) in not in His hands but performing proper action is!!

Narayana Narayana


(Kuldeep Kumar Kaul)

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It could mean  -  We must diligently do 'purshaarth'  (sincere effort), as we have the power 'to do'.   We must put forth total effort and abilities in doing,  renouncing pride of doership and desire for fruit.     But we have no power in the outcome,  which is dependent on 'praarabdh' (caused by fate / destiny) -  we must remain 'prasanna'.   We must trust that whatever is destined for us, is planned and due to us,  and that alone we shall receive,  and remaining happy in that alone.   

Bala GK 

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भैया GA Mittal जी!
पहले 'करनेमें सावधानी' को समझने लगा। 'होनेमें प्रसन्नता' को बहुत पहले ही समझ लिया था कि जब उसकी ही मरजी होती है तो चाहे प्रसन्न होवो चाहे रोवो, जो होना है सो होगा ही, हमारे दुखी होने या प्रसन्न होनेसे कोई अंतर नहीं पड़ेगा इसलिये रोकर (दुखी होकर) क्यों व्यर्थ आँखें फोड़ो? एक ही विकल्प बचा कि जो भी होवे, उसमें प्रसन्न रहो। 
आपने जो स्वामीजीका मूलमंत्र समझनेको कहा है, उसे मन-बुद्धिसे माननेसे तो कुछ हुआ नहीं और स्वयंसे मानना अभी आया नहीं तभी तो यह प्रश्न पूछनेकी जरूरत आ पड़ी। 
साधक मानता है कि जिसने स्वामीजीका मूलमंत्र [मैं भगवानका हूँ और केवल भगवान ही मेरे हैं] सिद्ध कर लिया उसके पास न कोई प्रश्न होगा और न ही उसे किसीसे उत्तर पानेकी जरूरत होगी, वह जिसका है और जो उसका है दोनों परस्पर (एक-दूसरेसे) सारी समस्यायें सुलट लेंगे। 
अस्तु। 


सविनय,
साधक  

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स्वामीजी ने "होनेमें प्रसन्नता" को महत्व ज्यादा दिया है । चिंता दीनदयाल को मन सदा आनंद । उनका करणनिरपेक्ष साधन है । क्या आपने "होनेमें प्रसन्नता" को समझ लिया है?

"मैं भगवान का हूं और भगवान मेरे है " - इसको आप समझ लो । करने में सावधानी को मतलब है की "मैं भगवान का हूं और भगवान मेरे है " मानकर करना ।

g a mittal

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HINDI:            http://www.swamiramsukhdasji.org




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Posted by: Sadhak <sadhak_insight@yahoo.com>
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