Friday, August 21, 2015

[gita-talk] प्रश्न नहीं, अनुरोध है यह

 

स्वामीजीका प्रत्येक कथन मार्मिक होता है और स्वामीजीका बताया प्रत्येक उपाय (विध्यात्मक या निषेधात्मक, दोनों) अचूक होता है। 
उनका एक निर्देश है : करनेमें सावधानी और होनेमें प्रसन्नता। 
साधक सम्प्रति इसके पूर्वार्ध अर्थात ''करनेमें सावधानी'' से क्या समझा, उसे गीता-वार्तामें सभी साधकोंसे share करना चाहता है। 
''करनेमें सावधानी'' से साधक यह समझा कि क्रिया चाहे कोई भी हो, उसमें ''मैं कर रहा/रही हूँ'' की भावना नहीं की जाय। 
सभी सुहृद साधक दया करके बतानेकी कृपा करें कि ''करनेमें सावधानी'' से उन्होंने क्या-क्या समझा? कौनसी सावधानी सर्वोच्च प्राथमिकतापर रखी? 
सविनय,
साधक 

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स्वामीजी ने "होनेमें प्रसन्नता" को महत्व ज्यादा दिया है । चिंता दीनदयाल को मन सदा आनंद । उनका करणनिरपेक्ष साधन है । क्या आपने "होनेमें प्रसन्नता" को समझ लिया है?

"मैं भगवान का हूं और भगवान मेरे है " - इसको आप समझ लो । करने में सावधानी को मतलब है की "मैं भगवान का हूं और भगवान मेरे है " मानकर करना ।

g a mittal

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HINDI:            http://www.swamiramsukhdasji.org

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Posted by: Sadhak <sadhak_insight@yahoo.com>
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