Sunday, August 23, 2015

[gita-talk] परमात्माके मिलनेकी लगन है या कुछ और ही चल र हा है?

 


परमात्माके मिलनेकी लगन है या कुछ और ही चल र हा है?

परमात्माके मिल जानेके अतिरिक्त, परमात्माके मिलनेकी लगन होनेको कैसे पहचाने?
यह कैसे पहचानें कि अब वास्तविक लगन हुई है या कुछ और चल रहा है?
कृपया उदाहरण सहित समझायें। 
इसे जानना इसलिये आवश्यक है कि कहीं कुछ और में ही जीवन न चला जाय, जैसा 
कि अभी तक गया है अन्यथा यह प्रश्न पूछा ही नहीं गया होता। 
सविनय,
साधक 

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  • मानने में कितनी लगन की जरूरत है । "प्रभु की प्राप्ति साधना से नहीं, केवल मान्यता से है" में लिखा है - "यह प्रश्न उठता है की जब बात इतनी सगम है तो ठहरती क्यों नहि। इसका उत्तर है की आप इस बात को महत्व नहीं देते, आदर नहीं देते । यहा अभ्यासजन्य नहीं है । इसे या तो मान लो या जान लो । जैसे यह नेपाल है इसका आपने अभ्यास नहीं किया, केवल मान लिया की यह नेपाल है । आप मानने में स्वतन्त्र हैं ।"

    आपने लिखा - " कहीं कुछ और में ही जीवन न चला जाय, जैसा कि अभी तक गया है" । इसका उत्तर स्वामीजी देते हैं - "मानना चाहो तो अभी मान सकते हो और न मानना चाहो हो जन्म-जन्मान्तर तक भी नहीं मान सकोगे । "
    क्या मानना है? स्वामीजी - "मैं हुँ यह आत्मज्ञान है और परमात्मा है यह परमात्मज्ञान है । मैं और परमात्मा की एकता है और शरीर और हमारी कहलाने वाली की सामग्री की संसार के साथ एकता है । अतः यह अपनी कही जाने वाली वस्तुओ के द्वारा संसार की सेवा कर देना है और अपने आप को परमात्मा को देना है । बस इतनी ही बात है । "
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HINDI:            http://www.swamiramsukhdasji.org


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Posted by: Sadhak <sadhak_insight@yahoo.com>
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