Thursday, August 20, 2015

[gita-talk] प्रश्न नहीं, अनुरोध है यह

 

स्वामीजीका प्रत्येक कथन मार्मिक होता है और स्वामीजीका बताया प्रत्येक उपाय (विध्यात्मक या निषेधात्मक, दोनों) अचूक होता है। 
उनका एक निर्देश है : करनेमें सावधानी और होनेमें प्रसन्नता। 
साधक सम्प्रति इसके पूर्वार्ध अर्थात ''करनेमें सावधानी'' से क्या समझा, उसे गीता-वार्तामें सभी साधकोंसे share करना चाहता है। 
''करनेमें सावधानी'' से साधक यह समझा कि क्रिया चाहे कोई भी हो, उसमें ''मैं कर रहा/रही हूँ'' की भावना नहीं की जाय। 
सभी सुहृद साधक दया करके बतानेकी कृपा करें कि ''करनेमें सावधानी'' से उन्होंने क्या-क्या समझा? कौनसी सावधानी सर्वोच्च प्राथमिकतापर रखी? 
सविनय,

साधक 

===================================



ENGLISH :    http://www.swamiramsukhdasji.net

HINDI:            http://www.swamiramsukhdasji.org


 

__._,_.___

Posted by: sadhak_insight@yahoo.com
Reply via web post Reply to sender Reply to group Start a New Topic Messages in this topic (1)
All past 4925+ messages are accessible and searchable at http://groups.yahoo.com/group/gita-talk/

28,000+ sadhakas

A list of all topics discussed in 2009 along with their links are at http://groups.yahoo.com/group/gita-talk/message/3189

.

__,_._,___

No comments: