Monday, August 24, 2015

[gita-talk] अवतार

 

संसारको उसका (परमात्माका) आदि अवतार कहा गया है। आदिका शब्दार्थ लें तो 
संसार उसका (परमात्माका) पहला अवतार हुआ। इस चतुर्युगमें कुल तेईस अवतार 
बताये गये हैं जिनमें संसार पहला अवतार है जो अभी भी है (विलुप्त नहीं हुआ है),
जबकि शेष बाईस अवतारोंमेंसे एक भी (आज) नजर नहीं आता। क्या यह अटपटा 
नहीं लगता कि आदि अवतार तो विद्यमान है और उसके बादके सभी अवतार पूरी 
तरह विलुप्त हैं? यदि विलुप्त नहीं हैं तो नजर क्यों नहीं आते? यदि विलुप्त हैं तो 
क्या वे सभी (जिनमें सर्वश्री राम, कृष्ण, बुद्ध आदि भी गिने गये हैं) इस संसारसे 
(आदि अवतार) किसी तरह कमजोर थे जो उन्हें (अगला अवतार होनेके पहले ही)
विलुप्त होना पड़ा? किन्हीं दो अवतारोंके (प्राणी रूपमें) समकालीन होनेका वर्णन 
साधकको ज्ञात नहीं है। 
कृपया समाधान दें। 
सविनय,
साधक  

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>> संसारको उसका (परमात्माका) आदि अवतार कहा गया है। 

Please understand above statement as described in Bhagavatam 11/13/24. "Within this world, whatever is perceived by the mind, speech, eyes or other senses is Me alone and nothing besides Me. All of you please understand this by a straightforward analysis of the facts."

>> इस चतुर्युगमें कुल तेईस अवतार बताये गये हैं जिनमें संसार पहला अवतार है जो अभी भी है (विलुप्त नहीं हुआ है),

I think you should read Bhagavatam and get facts from Bhagavatam. Please especially read 3rd chapter of 1st canto.

>>  किन्हीं दो अवतारोंके (प्राणी रूपमें) समकालीन होनेका वर्णन  साधकको ज्ञात नहीं है। 

Ram and Parashuram were at the same time.

Bhagavatam 1.3.8 describes Narada as avatar. He is supposed to be still existing. He does not have human form. He is son of Brahma and part of Brahma-loka.

Bhagavatam 1.3.21 describes Veda Vyas as avatar. He is supposed to be still existing in Himalayas.

Please read Bhagavatam to resolve your doubts.


g a mittal

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आप क्यों भगवान परशुराम और श्री राम को भूल गए? भगवान परशुराम और श्री कृष्ण को भूल गए? 

sayon kk

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[gita-talk] Daily Bhagavad Gita Message (Gita 18-42)

 

  ||   Shree Hari    ||

Daily Bhagavad Gita Message  


Gita 18-41


śamo damastapaḥ śaucaṁ kṣāntirārjavameva ca
jñānaṁ vijñānamāstikyaṁ brahmakarma svabhāvajam

Restraining the mind; controlling senses; enduring hardships for the sake of sacred duty; maintaining internal and external purity; forgiving the fault of others; keeping straightforwardness of mind and senses; have knowledge of scriptures, experiencing proper performance of Yajna (sacrifice); having faith in Vedas and God-- these are  the duties of Brāhmin born of his own nature.

Comment:

If the 'Varṇa' tradition has been properly followed, a Brāhmin naturally possesses these qualities. But if there is intermingling of castes, then the Brāhmiṇs do not naturally possess these qualities, there is a shortcoming in these qualities.

In the preceding verse, the expression 'svabhāvaprabhavairguṇaiḥ' was used, therefore here the Lord mentions 'svabhāvaja karma' (the action born of own nature). In the making of Svabhāva the prime importance is of birth and then the company a person keeps is important. Due to-- the company one keeps, the self study of scriptures and practice etc., the Svabhāva (nature) changes.


From Gita Prabodhani in Hindi, by Swami Ramsukhdasji


Ram Ram



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Sunday, August 23, 2015

[gita-talk] परमात्माके मिलनेकी लगन है या कुछ और ही चल र हा है?

 


परमात्माके मिलनेकी लगन है या कुछ और ही चल र हा है?

परमात्माके मिल जानेके अतिरिक्त, परमात्माके मिलनेकी लगन होनेको कैसे पहचाने?
यह कैसे पहचानें कि अब वास्तविक लगन हुई है या कुछ और चल रहा है?
कृपया उदाहरण सहित समझायें। 
इसे जानना इसलिये आवश्यक है कि कहीं कुछ और में ही जीवन न चला जाय, जैसा 
कि अभी तक गया है अन्यथा यह प्रश्न पूछा ही नहीं गया होता। 
सविनय,
साधक 

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  • मानने में कितनी लगन की जरूरत है । "प्रभु की प्राप्ति साधना से नहीं, केवल मान्यता से है" में लिखा है - "यह प्रश्न उठता है की जब बात इतनी सगम है तो ठहरती क्यों नहि। इसका उत्तर है की आप इस बात को महत्व नहीं देते, आदर नहीं देते । यहा अभ्यासजन्य नहीं है । इसे या तो मान लो या जान लो । जैसे यह नेपाल है इसका आपने अभ्यास नहीं किया, केवल मान लिया की यह नेपाल है । आप मानने में स्वतन्त्र हैं ।"

    आपने लिखा - " कहीं कुछ और में ही जीवन न चला जाय, जैसा कि अभी तक गया है" । इसका उत्तर स्वामीजी देते हैं - "मानना चाहो तो अभी मान सकते हो और न मानना चाहो हो जन्म-जन्मान्तर तक भी नहीं मान सकोगे । "
    क्या मानना है? स्वामीजी - "मैं हुँ यह आत्मज्ञान है और परमात्मा है यह परमात्मज्ञान है । मैं और परमात्मा की एकता है और शरीर और हमारी कहलाने वाली की सामग्री की संसार के साथ एकता है । अतः यह अपनी कही जाने वाली वस्तुओ के द्वारा संसार की सेवा कर देना है और अपने आप को परमात्मा को देना है । बस इतनी ही बात है । "
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Saturday, August 22, 2015

[gita-talk] परमात्माके मिलनेकी लगन है या कुछ और ही चल र हा है?

 


परमात्माके मिलनेकी लगन है या कुछ और ही चल र हा है?

परमात्माके मिल जानेके अतिरिक्त, परमात्माके मिलनेकी लगन होनेको कैसे पहचाने?
यह कैसे पहचानें कि अब वास्तविक लगन हुई है या कुछ और चल रहा है?
कृपया उदाहरण सहित समझायें। 
इसे जानना इसलिये आवश्यक है कि कहीं कुछ और में ही जीवन न चला जाय, जैसा 
कि अभी तक गया है अन्यथा यह प्रश्न पूछा ही नहीं गया होता। 
सविनय,
साधक 

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Friday, August 21, 2015

[gita-talk] प्रश्न नहीं, अनुरोध है यह

 

स्वामीजीका प्रत्येक कथन मार्मिक होता है और स्वामीजीका बताया प्रत्येक उपाय (विध्यात्मक या निषेधात्मक, दोनों) अचूक होता है। 
उनका एक निर्देश है : करनेमें सावधानी और होनेमें प्रसन्नता। 
साधक सम्प्रति इसके पूर्वार्ध अर्थात ''करनेमें सावधानी'' से क्या समझा, उसे गीता-वार्तामें सभी साधकोंसे share करना चाहता है। 
''करनेमें सावधानी'' से साधक यह समझा कि क्रिया चाहे कोई भी हो, उसमें ''मैं कर रहा/रही हूँ'' की भावना नहीं की जाय। 
सभी सुहृद साधक दया करके बतानेकी कृपा करें कि ''करनेमें सावधानी'' से उन्होंने क्या-क्या समझा? कौनसी सावधानी सर्वोच्च प्राथमिकतापर रखी? 
सविनय,
साधक 

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स्वामीजी ने "होनेमें प्रसन्नता" को महत्व ज्यादा दिया है । चिंता दीनदयाल को मन सदा आनंद । उनका करणनिरपेक्ष साधन है । क्या आपने "होनेमें प्रसन्नता" को समझ लिया है?

"मैं भगवान का हूं और भगवान मेरे है " - इसको आप समझ लो । करने में सावधानी को मतलब है की "मैं भगवान का हूं और भगवान मेरे है " मानकर करना ।

g a mittal

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[gita-talk] ''भगवानको याद करना'' का अर्थ समझना है

 

''भगवानको याद करना'' का  अर्थ समझना है
कहा है : पृथ्वीजलतेज आदि तत्त्वोंमेंचन्द्रसूर्य आदि रूपोंमेंसात्त्विकराजस और तामस भावक्रिया आदिमें भगवान् ही परिपूर्ण हैं । ब्रह्मजीवक्रियासंसारब्रह्मा और विष्णुरूपसे भगवान् ही है । इस तरह तत्त्वसे सब कुछ भगवान्-ही-भगवान् है ।
आगे कहा है : जो अन्तसमयमें भगवान्का चिन्तन करता हुआ शरीर छोड़ता हैवह भगवान्को ही प्राप्त होता है । उसका फिर जन्म-मरण नहीं होता । अतः मनुष्यको सब समयमेंसभी अवस्थाओंमें और शास्त्रविहित सब काम करते हुए भगवान्को याद रखना चाहियेजिससे अन्तसमयमें भगवान् ही याद आयें ।
साधकको जिज्ञासा है कि जब तत्त्वसे सब कुछ भगवान-ही-भगवान हैं तो अंतसमयमें ही क्या, किसी भी समय मनुष्य ही क्या कोई भी प्राणी, जो भी चिंतन करेगा (याद करेगा) वह भगवानके अतिरिक्त होगा ही क्या और भगवानके अतिरिक्त हो भी सकता है क्या? यदि हो सकता है तो उपरोक्त दोनों कथनका मर्म क्या है?
कृपया स्पष्ट उदाहरणसहित (कि यह याद करना तो भगवानको याद करना है और यह याद करना भगवानको याद करना नहीं है) समझानेकी कृपा करें।सविनय,
साधक 

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हरि शरणम् 
जब तक किसी को भगवान, समय और चिन्तन अलग-अलग प्रतीत  हो रहा है , उसके लिये तत्त्व एक होने पर भी उसका चिन्तन भगवान से अलग कल्पित है |  इसलिये उसको हर पल भगवान को याद / चिन्तन की सलाह दी जाती है जिससे वह , उसका चिन्तन और उसका समय भगवदमय होकर सिर्फ़् भगवान और उनकी अपनी लीला रह जाय जो कि तत्त्वतः ऐसा ही है |
आपका 
नीतीश दूबे 

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Swami Ramsukhdas states in Appendix of 8.14 in Sadhak Sanjivini --

"ananyacetah" - When a devotee holds that there is no other entity besides God, then how will his mind wander? Why will it wander? Where will it wander? Therefore, he naturally becomes "ananyacetah" viz, he whose mind is undivided and who depends only on God - 'satatam yo mam smarati nityasah' -- one is 'to do' and the other is 'to take place'. What is done is action and whatever takes place is remembrance. As at the end of Gita, Arjuna said 'smriti-labdha 18/73', memory is not an action but it is remembrance of one's eternal relationship (intimacy) of God. The 'sense of mine' with God is the main factor for His memory. God is mine and He is for me - by this mineness, love (devotion) for God naturally develops and when we love, He is naturally and constantly remembered by us. Therefore at the beginning of the seventh chapter by the expression 'mayasakta-manah' the Lord has mentioned to get attached to Him viz to love Him. It means that the striver regards only God as his and for him, He becomes loving to him. When this lovingness is developed, God is naturally remembered.

>> किसी भी समय मनुष्य ही क्या कोई भी प्राणी, जो भी चिंतन करेगा (याद करेगा) वह भगवानके अतिरिक्त होगा ही क्या और भगवानके अतिरिक्त हो भी सकता है क्या?

Person holds that there is no other entity besides God will only think of God. He will also see others only thinking of God.

Those who don't see (or accept) God's presence in all have to externally try to remember Him. After many births they come to understanding of vasudeva sarvam and then, true remembrance happens.  (Gita 7/19)

>> जो अन्तसमयमें भगवान्का चिन्तन करता हुआ शरीर छोड़ता हैवह भगवान्को ही प्राप्त होता है । 

This applies to those who don't hold vision there is no other entity besides God. But Swami states in next sentence that such state is only possible for those who hold vision there is no other entity besides God. 

>> अतः मनुष्यको सब समयमेंसभी अवस्थाओंमें और शास्त्रविहित सब काम करते हुए भगवान्को याद रखना चाहियेजिससे अन्तसमयमें भगवान् ही याद आयें ।

This is only possible for one who holds that there is no other entity besides God.

g a mittal

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हरि ओम

एक तो जो "स्वत : सिद्ध"  है , और एक जो आप "मानते" हो - दूसरे शब्दों में एक जो "है" और एक जो आप "मानते" हो - रस्सी "है" ..साँप "मानतेप" हो - महाराज - जो आप "मानते" कहो, वही "अनुभव" बनेगा , न कि जो आप "जानते" हो या जो "स्वत: सिद्ध" है !!!!

जय श्री कृष्णा

व्यास एन बी

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Hello,

I remembering God all the time means "thinking divine" which can be 
done all the no matter what you may doing physically. In Bhagwat
Gita, God Krishna "orders" Arjun when he was ready o shoot his 
arrow, to do what he was doing but keep God Krishna in your his mind, all the
time.

Good Luck!

Notesav 

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