Thursday, February 5, 2015

[gita-talk] परमात्मा और परमात्माकी सत्ता, परमात्मतत्त्व, सत्ता, 'है'-पना आदि

 




प्रश्न 'सबमें परमात्माको कैसे देखें?' का उत्तर देते समय कहा है : 
'मनुष्य है' -- इसमें जो 'है'-पना है, सत्ता है, वह कभी मिटती नहीं। 
आगे कहा है : वह सत्ता परमात्माकी है। 
यह भी कहा है : सबमें एक परमात्मतत्त्वकी सत्ता है। 
और यह भी कहा है : साधककी दृष्टि परमात्मतत्त्वपर ही होती है सबमें जो परमात्मा है, उसीको प्राप्त करना है, … 
बताना यह है कि शब्द 'परमात्मा' को पढ़ते (या सुनते) ही (मन-बुद्धिमें) एक (या अनेक) अवतार-रूप चित्रित होता है, 
जबकि शब्द 'है'-पना, या 'सत्ता', या 'परमात्माकी सत्ता', या 'परमात्मतत्त्व' को पढ़ते (या सुनते) ऐसा कुछ भी नहीं होता 
अपितु भीतरमें एक अनिर्वचनीय अनुभूतिसी होती है जिसे शब्दोंमें बताना नहीं बनता
प्रश्न यह है : क्या [ 'है'-पना, सत्ता, परमात्मतत्त्व, परमात्माकी सत्ता आदि ] और 'परमात्मा' भिन्न हैं?
यदि भिन्न नहीं हैं तो शब्दों 'है'-पना, या 'सत्ता', या 'परमात्माकी सत्ता', या 'परमात्मतत्त्व' को और शब्द 'परमात्मा' को 
पढ़ने (या सुनने) से एक समान अनुभूति क्यों नहीं हो रही? साधकसे भूल या चूक या गलती कहाँ हो रही है?
कृपया समझायें।  
सविनय,
साधक  

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स्वामी रामसुखदासजी  की नित्य प्रार्थना 
                                
 प्रार्थना
    हे नाथ! आपसे मेरी प्रार्थना है कि आप मुझे प्यारे लगें। केवल यही मेरी 
माँग है, और कोई माँग नहीं। 
    हे नाथ! अगर मैं स्वर्ग चाहूँ तो मुझे नरक में डाल दें, सुख चाहूँ तो 
अनन्त दुःखों में डाल दें, पर आप मुझे प्यारे लगें। 
    हे नाथ! आपके बिना मैं रह न सकूँ, ऐसी व्याकुलता आप दे दें। 
    हे नाथ! आप मेरे हृदय में ऐसी आग लगा दें कि आपकी प्रीति के बिना मैं जी न 
सकूँ। 
    हे नाथ! आपके बिना मेरा कौन है? मैं किससे कहूँ और कौन सुने?
    हे मेरे शरण्य! मैं कहाँ जाऊँ? क्या करूँ? कोई मेरा नहीं। 
    मैं भूला हुआ कइयों को अपना मानता रहा। उनसे धोखा खाया, फिर भी धोखा खा 
सकता हूँ, आप बचायें!
    हे मेरे प्यारे! हे अनाथनाथ! हे अशरणशरण! हे पतितपावन! हे दीनबन्धो! हे 
अरक्षितरक्षक! हे आर्तत्राणपरायण! हे निराधार के आधार! हे अकारणकरुणावरुणालय! 
हे साधनहीन के एकमात्र साधन! हे असहाय के सहायक! क्या आप मेरे को जानते नहीं, 
मैं कैसा भग्नप्रतिज्ञ, कैसा कृतघ्न, कैसा अपराधी, कैसा विपरीतगामी, कैसा 
अकरणकरणपरायण हूँ। अनन्त दुःखों के कारणस्वरूप भोगों को भोगकर-जानकार भी आसक्त 
रहनेवाला, अहित को हितकर माननेवाला, बार-बार ठोकरें खाकर भी नहीं चेतनेवाला, 
आपसे विमुख होकर बार-बार दुःख पानेवाला, चेतकर भी न चेतनेवाला, जानकर भी न 
जाननेवाला मेरे सिवाय आपको ऐसा कौन मिलेगा?
    प्रभो! त्राहि माम्! त्राहि माम्!! पाहि माम्! पाहि माम्!! हे प्रभो! हे 
विभो! मैं आँख पसारकर देखता हूँ तो मन-बुद्धि-प्राण-इन्द्रियाँ और शरीर भी 
मेरे नहीं हैं, फिर वस्तु-व्यक्ति आदि मेरे कैसे हो सकते हैं! ऐसा मैं जानता 
हूँ, कहता हूँ, पर वास्तविकता से नहीं मानता। मेरी यह दशा क्या आपसे किञ्चित् 
मात्र भी कभी छिपी है? फिर हे प्यारे! क्या कहूँ! हे नाथ! हे नाथ!! हे मेरे 
नाथ!!! हे दीनबन्धो! हे प्रभो! आप अपनी तरफ से शरण में ले लें। बस, केवल आप 
प्यारे लगें। 
    भक्त-चरित्र पढ़कर, खूब अच्छा भाव बनाकर सुबह-शाम और मध्याह्न- तीनों समय 
भगवान् से यह प्रार्थना करनी चाहिये। 
    - परमश्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज 

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हरि ओम

बुद्धि का प्रयोग करते हैं - यह ग़लती है ! जो मन में आजाय , उसको मापदण्ड बनाते हैं - यह चूक है ! ब्रह्म को बुद्धि का विषय बनाया है, जैसे संसार को " समझते " हैं, वैसे ही परमात्म तत्व को समझने का प्रयत्न करना - यह भूल है ! 

मूल प्रश्न है - समान अनुभूति क्यों नहीं होती ? उत्तर है- क्योंकि समान स्वीकृति नहीं है ! आप जैसी स्वीकृति करते हैं, वैसा ही अनुभव होता है ! आपकी परमात्मतत्व के बारे में एक अवतार की स्वीकृति है ( राम, कृष्ण इत्यादि) और एक सत्ता की स्वीकृति है ! दो अलग-अलग स्वीकृतियाँ हैं, अत: अलग-अलग अनुभव हैं ! यदि एक सत्तामात्र ही है तो फिर राम-कृष्ण कैसे ? जब आप सत्ता का ध्यान करें तो , केवल सत्ता की ही बात करें ! परमात्मा तो सब कुछ हैं, साकार भी हैं, निराकार भी हैं, सगुण भी हैं, निर्गुण भी हैं- समग्र हैं ! " परमात्मा" और "परमात्मतत्व" - इसे समझें ! स्वाध्याय करो, स्वाध्याय ! कोई चीज़ पढ़ते ही फुदको मत, विचार करो, फिर पढो, फिर विचार करो - विवेक को प्रयोग करो , उसको आदर दो ! तर्क मत करो ! 

और ये जो आप "शब्द पढ़ने से अनुभूति" वाली बात कहते हैं, यह आपके मन-बुद्धि का विकार मात्र है । अनुभूति "स्वयं" का विषय है, मन-बुद्धि का नहीं ! अनुभव "स्वयं" करता है, और वह अनुभव " पढने" से नहीं, "पढ़कर समझने" से नहीं, बल्कि "स्वीकृति" से उत्पन्न होता है ! आप " आध्यात्मिक " बातों का मन-बुद्धि का विषय न बनायें तो आपकी उन्नति थोड़ी शीघ्र होगी ! 

स्वामीजी की बात याद आगयी - " संसार को भगवान् का स्वरूप देखने में किसी प्रयास की अथवा विवेक की ज़रूरत नहीं है, सीधे-सरल भाव से देखें" ! आपको भी स्वामीजी इसी तरह समझा रहे थे, लेकिन आप बुद्धि का प्रयोग करके कहाँ -से-कहाँ विषय को ले गये ? यह "अनिर्वचनीय अनुभूति" इत्यादि , अभी तक आपमें वास्तविक नहीं है, केवल मन-बुद्धि का विकार है, आभास मात्र है, शून्य की प्रतीति मात्र है ! " स्वीकृति" - इस विषय पर ध्यान दें ! 

जय श्री कृष्णा

व्यास एन बी 
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i can give simple example of paramatma ko kaise dekhe.. we dont see stars in the day but see in the night hence we cant say there is no stars same way god exits but you should long for him and say i am longing to see god, when you use lense the sun rays are concentrated in one place it will burn your finger if you remove the lense the sun rays are spread, same way our mind spread on all directions but to see god you have concentrate yearn for him we cry for husband, wife, mother , father, brother, sisters, friends, money , property everything but we dont cry for god do we, we call on our mobile phone non stop till we get connected but does we connect the same way with god, if done definitely we will see god, paramatma, it is hard day and night forgetting, food, clothing, health, every comfort every luxury has to be sacrificed ''tyag jeevan'' we should renounce one by one what we were used to enjoy once enjoyed the mind lake records and the mind hankers again and again to enjoy that if we dont get a cup of coffee or tea we will walk long distance to get that hot cup we are addicted, tobaco, alchohol to meet loved ones it is endless to learn any new thing of this world we spend our whole life but we never try to go in the direction or path or road towards god it is empty sri ramakrishna paramahamsa did penance for 17 years and when kali did not give darshan he was about to kill himself and she came for dhruva, prahlad there was no work other than doing tapas, day and night for 6 months in forest and others got doubt how in 6 months it was possible, narayana told in the previous many janmas they had done rigorous tapasya and only 6 months was balance and after completion of that god came rana ne vish diya mano amrit piya...baiti santo kay sangh angi mohan kay rang ..woh to gali gali hari gun gane lagi ...mehlo may pali ban kay jogan chali meera rani diwani kahane lagi... yes people will call such persons who are mad with god intoxication god bless you 

swamiji  (Swami Krishnanand)  

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Dear Sadak,

You can not get to divine by just talking about him or listening about God.
Why don't you plan to do something about it? Plan to empty your mind,
then, plan to pray in your thinking. You will experience divine in your 
thinking in due course of time. You will get your "peace of mind" first in
about six or so months and as soon as you "empty" your minds.

How to get done the above? I am attaching the copyright method to
you ( Mr. Amit) guise. This file is showing up as doc.docx here but 
this is simply a .doc file. The font is mangalb.

Avadhesh (Notesav)

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Posted by: Sadhak <sadhak_insight@yahoo.com>
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