Tuesday, November 25, 2014

[gita-talk] How is one to not see the "IS NOT" (unreal) and only see the "IS" (real, existent) ?

 


It is said :   'he who sees in all perishing beings,  the Paramatma (God) who is beyond destruction and is established in the form of equanimity  (who does not see the IS-NOT and only sees the IS "Real, Existence"),  he alone, in fact sees.   
The dilemma is  (even on reading too it is not understood,   that how is one to do so?)  That not to see the IS-NOT (non-existence,  unreal,  the perishable)  and only see the IS (real, existence) ?   [because "IS NOT" even though is is not there, it is seen,  and the "IS" even though it exists,  it is not visible?]   

If someone has seen the "IS" (then please giving current example, will be more relevant),  then please share, and also include how (with what rituals, actions, austerities, magical powers) he was able to see the unseen "IS" in the seen "IS NOT"  




कहा है : 'जो नष्ट होते हुए सम्पूर्ण प्राणियोंमें परमात्माको नाशरहित और समरूपसे स्थित देखता है (नहीं' को न देखकर केवल 'है' को देखता है)वही वास्तवमें सही देखता है ।'
समस्या है (पढ़कर भी समझमें नहीं आया है कि कैसे ऐसा हो?) कि 'नहीं' को न देखकर केवल 'है' को कैसे देखा जाय? [ क्योंकि 'नहीं' तो नहीं होते हुये भी दीखता है और 'है' होते हुये भी दीखता ही नहीं? ] 
यदि किसीने 'है' को देखा हो [ कृपया आजके उदाहरण देना अधिक प्रासंगिक होगा ] तो कृपया बताया जाय और यह भी कि उसने न दीखनेवाले 'है' को दीखनेवाले 'नहीं' में कैसे (विधि, क्रिया, तपस्या, दिव्यचक्षु आदि) देख पाया? 
सविनय,
साधक 


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Respected one and All, 
Every state of being is a set of attributes. whatever  " is"  or "Is-not"  are both states of beings from different perspectives. The former is desirable state of being whereas the later is undesirable state of being. Whatever, one sees depends upon the focus of the seer(drishti) on the attributes(Gun) comprising corresponding state of being(perspective). One who wants to see has to come out of bondages of his bondages of his five physical senses and all his intentions and perceptions (all karmas and its fruits) and has to be a giver of attributes(Gun data) to any state of being. In this way One who sees this way will see only "Is" and all is-not will cease to exist (as all is the play of "Maya") will see only desired attributes in any state of being. As all 'is' and 'is not' both are play of Maya In this way one becomes "Mayadeesha"  master of Maya creator of miracles a God or semi God in the realm of materialistic forms provided he can makes himself and others to believe in his imaginations (mental projections).
Dr. Ay Ky Mukhii

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dear sadhak it is not possible to observe the spiritual secrets with material instruments. for seeing the matter sense organs are provided and for realizing the essence behind all this matter inner faculties are provided by the providence as the spirit is invisible so by intellect and arguments one can not realize and enjoy the unseen spirit, need is to improve your inner faculties and to operate the process, one has to follow the second step of navdhah bhakti. that is self retrospection observing and comparing the unseen with seen you will find in due the spirit is not this not this known as process of neeti neeti. gradually you will come to a stage where you will feel and enjoy the unseen. as the spirit is to be felt and enjoyed as bliss. now you try and come back to me after three months I am sure you will get the satisfactory solution to your query. reading and arguing is no way to see or feel the unseen in short God.

c k kaul

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Dear Sadhakas, Namaskar,

It is really a nice topic you have opened for discussion.
You have to tell the children....well, if you do good things and behave nicely to others, 
everybody will like you, your parents will like you, your friends will like you,,, so it will 
be heaven...where ever you go. But if you do bad things, if you behave badly with others...you 
will not be liked by anybody...police will send you to jail...where you will have no friends, 
very little food, you will have to sleep on the floor with no blanket....your life will be 
miserable...and that is hell.

The same technique have been tried by the Great Thinkers of the Past (GTPs) on us. They had a 
sincere desire that the society should be educated, cultured, moral, ethical, healthy and 
happy.So they introduced the concept of hell and heaven so that everybody will behave 
properly. So they introduced religions and cultivated fear of God.

Gee Waman 

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हरि ओम

शाबास, सविनय बाबू ! 

सबसे पहले अन्तिम पंक्ति -  "स्वयं (स्वयंसे) न तो कुछ कर सकता है और न भोग ही सकता है फिर 'है'का 'अनुभव होना' कैसे करा सकता है?" ! 

यह आपका पूर्वाग्रह (दुराग्रह)  है कि स्वयं भोग नहीं सकता !!! अगर स्वयं नहीं भोगता है , तो कौन भोगता है ? शरीर , मन, बुद्धि तो जड़ हैं, कैसे भोगेंगे ? गीता क्या कहती है ? " पुरूष : सुखदुखानाम् भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते" ( १३/१९-२०) ! यह भी आपका पूर्वाग्रह ( दुराग्रह ) ही है कि " अनुभव " होना पुरूष का कार्य नहीं ! तो फिर किसका है ? " अनुभव" केवल और केवल "स्वयं" ही करता है । चेतन तत्व अनुभव के सिवाय और कर भी क्या कर सकता है ? सुख दुख का अनुभव, भोग , भय, आनन्द , जलन, शान्ति, अशान्ति, उद्वेग आदि का अनुभव चेतन ( स्वयं) को ही होता है, जड़ शरीर, मन , आदि को नहीं ! सबसे पहले इस बात को समझो ! स्वयं ही तो "है" का अनुभव करेगा ( करायेगा) , और कौन करायेगा ? पुरूष स्वयं " अनुभवरूप" ही है ! नहीं है क्या ? गाढ़ नीन्द में सुख का अनुभव कौन करता है ? बताओ !!! कौन कहता है - " रात को बड़े सुख से सोया, कुछ पता नहीं चला" - यह किसका अनुभव है ? क्या जँची ?? खुल के बोलो, डरो मत ! खुल के शंका करोगे तो बात खुलेगी !

मेरा पूर्वाग्रह कभी नहीं था, आपकी भाषा में विधि, दिव्यचक्षु, क्रिया, तपस्या जैसे भारी भरकम शब्दों के अलंकारों किसी को भी वही संकेत देंगे तो मैंने समझा ! आप तो "उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे" - इस कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं, मान्यवर ! ख़ैर, अब आपने ख़ुद के माने हुए मेरे पूर्वाग्रह से मुझे मुक्त किया है, तो लीजिये हम मुक्त हो गये !

 प्रश्न बाक़ी क्या रहा? " अनुभव कैसे हो " - यही रहा ना ? आपका दुराग्रह कि पुरूष अनुभव नहीं कर सकता - यह तो उपर दिये गये स्पष्टीकरण से हट ही गया होगा - नहीं हटा तो बोलो ! 

"अनुभव कैसे हो " ? अनुभव मानने से, स्वीकृति से होता है !  दृढता सेसंसार को असत् मान लो, "नहीं" को "नहीं" मान लो, "है" अनुभव में आ जायेगा ! "मानना" तो आता है ना? अरे बाबा, रस्सी कोसांप मानने से साँप दीखने लग जाता है, भय का अनुभव होने लग जाता है - मानने मात्र से !! होता है ना ? वहाँ तो साँप है ही नहीं , अवास्तविक की मान्यता है ,फिर भी अनुभव होता है ना ? यहाँ तो "है" है, वास्तविक मान्यता होगी, तो फिर अनुभव कैसे नहीं होगा ? बोलो !!!! यह नियम है कि मानने के बाद जानना (अनुभव) हो ही जाता है ! यह है उत्तर !! पहले स्वीकृति, फिर अनुभव ! संसार को स्थाई मानते हैं, तब भोग के सुख का अनुभव होता है । यदि संसार को क्षण भंगुर मान लो तो भोगों में सुख अनुभव होगा ही नहीं !! क्या जँची ?

जय श्री कृष्णा

व्यास एन बी 
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Respected Divine Sadhaks

While reading the question, an old stanza - given below -  heard from the Pravachans of Swamiji came to my mind.  

Hai So Sunder Hai Sadaa, Nahin So Sunder Naahin
Nahin So Pargat Dekhiye Hai So Deekhe Naahin!!!

I seek your forgiveness if it is irrelevant in the context.

Regards

m m batra

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राम राम बड़े भैया,
पहले आप पूर्वाग्रह (कि साधक मनसे, बुद्धिसे या शरीरसे उस 'है'को देखना चाहता है) से मुक्त होकर प्रश्न पढ़ें फिर बतायें कि  'नहीं'को नहीं देखकर 'है'को कैसे देखना है? 
देखना शब्दका निहितार्थ 'अनुभव होना' प्रश्नमें पहले भी था और अभी भी है (इसकी व्याख्या अनावश्यक है)। 
वाक्यांश नहीं' को न देखकर केवल 'है' को देखता है में निश्चित रूपसे 'देखता' शब्दका निहितार्थ 'अनुभव होना' है।
साधक समझता है कि यह 'देखना' (स्वयंसे अनुभव होना) उस 'देखना' (किसी करणसे अनुभव करना) से भिन्न है, यही तो गुत्थी है। स्वयं (स्वयंसे) न तो कुछ कर सकता है और न भोग ही सकता है फिर 'है'का 'अनुभव होना' कैसे करा सकता है?
यह समझना था। 
सविनय,
साधक 

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Dear Sir,
One example where very few people who are experts prefer to see the IS over IS NOT is mathematical/scientific concepts.
One mathematical/Scientific concept has many applications like  Fourier transformation, Laplace transformations etc.
These concepts find their application in Video/Audio Codecs and many other applications.
Most people only interested in watching movie or listening the content. While the concept playing underneath is seen by few experts.
The experts of maths and science with more experience fully get into the concepts & theories and start showing less & lesser interest in their applications, as they realize that applications keep changing but fundamentals don't.
 
Other example in real estate is land vs its applications(flat, agriculture, house etc). Most people only worry about applications but experts in real estate go for the fundamental.
 
Same way god's play is experienced by devotees, when they get tuned to bhakti (in all aspects of body, senses, mind, soul, five elements).
regds,
sadhak
r mehta 
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हरि ओम

हमेशा की तरह ही सविनय साधक महाशय का प्रश्न है ! जो समझने का विषय ही नहीं है, बस वहीसमझना चाहते हैं । बड़ी समस्या है यह उनकी - हमेशा वही जानना चाहते हैं , जो ज्ञान का विषय ही नहीं है । ख़ैर यह कोई नई बात है नहीं , उनका यह रोज़ का काम है । फिर भी उत्तर तो देना ही पड़ेगा । 

भैया, आपने स्वयं लिखा है ना कि "है होते हुए भी दीखता नहीं " - लिखा है ना ? लिखा है कि नहीं ? लिखा है । आपकी बात गलत नहीं है । सन्तों की वाणी में भी आया है - " है सो सुन्दर है सदा, नहीं सो सुन्दर नाहीं । नहीं सो प्रकट देखिये, है सो दीखे नाहीं ।। " - तो भैया यहाँ चक्षुओं को, मन को, बुद्धि को, शरीर को लेकर आप कुछ नहीं कर सकते । जो चीज दीखने में आती ही नहीं, आप ख़ुद भी इस बात को मानते हैं, तो फिर आपका यह प्रश्न कि किसी ने देखा हो तो बताओ, यह प्रश्न क्या कोई समझदार का प्रश्न है ? कौन क्या उदाहरण देगा, कैसे देगा ? विचार तो कीजिये ! " आकाश का फूल " होता ही नहीं, आप जानते हैं और जानने के बावजूद पूछते हैं कि यदि किसीने आकाश का फूल देखा हो, तो उदाहरण दो । अब जो चीज़ होती ही नहीं है, उसका कोई क्या उदाहरण देगा ? उसी प्रकार जो दीखती ही नहीं, उसे देखने का कोई क्या उदाहरण देगा ? यह तो हुई " नहीं" द्वारा "है" को देखने की बात । 

शास्त्रों में जो " देखने" की बात आई है , वह " पश्यति " है । वहाँ आंखों से देखना नहीं है, " भान" होना है, " अनुभव " होना है । वहाँ आँखों की, विधि की, क्रिया की, तपस्या की या दिव्य चक्षुओं की बात ही नहीं है - आप क्यों माथा खपा रहे हैं कि चक्षुओं से कैसे देखें ? वह देखना "नहीं " के द्वारा होता ही नहीं ! वहाँ "देखना" शब्द का मतलब "अनुभव" करना है, समझना है - उसमें " नहीं" क्या करेगा ? आप "स्वयं" हैं-  हैं ना ? अब इसको देख सकते हो क्या ? ख़ुद को " देख" सकते हो क्या ? कभी देखा है ? कभी मन में आई है क्या कि ख़ुद को कैसे देखू ? क्यों नहीं मन में आई ? क्योंकि वहाँ संदेह है ही नहीं। लेकिन " मैं हूँ " - यह अनुभव तो सबको है - आपको, मुझे सबको है । पशु, पक्षी भी "मैं हूँ" यह अनुभव करते हैं । अब यहाँ चक्षु क्या करेंगे ? शास्त्रों में , जो "देखने" की बात कहीं है, वह "अनुभव" करने का द्योतक है ! " नहीं" ठहरता ही "है" के कारण है । "है" स्क्रीन पर ही आप "नहीं" फ़िल्म चलती देख सकते हैं । यह अनुभव का विषय है- चक्षुओं का, तपस्या का, क्रिया का विषय है ही नहीं । अब आप लगें ांय उदाहरण ढूँढ़ने में  । अब आपको क्या कहें ?  निरन्तर परिवर्तनशील तत्व उसी को "दिखता" है जो स्वयं अपरिवर्तनशील होता है । "है" ही "नहीं" का प्रकाशक होता है ! विनाशी तत्व अविनाशी प्लेटफ़ार्म के बिना दिखेगा कैसे ? जब सिनेमा चलता है, तो स्थिर स्क्रीन दिखती है क्या ? लेकिन समझदार आदमी तो जानता है ना कि बिना स्थिर स्क्रीन के फ़िल्म कैसे चलेगी ! बस यही जानना शास्त्रों में "देखना" नाम से बताया गया है ! शास्त्र यही कहते हैं कि विनाशी स्चलतीुई फ़िल्म के पीछे अविनाशी स्क्रीन को देखो । विनाशी किसी अविनाशी प्लेटफ़ार्म पर ही दृष्टिगोचर हो रहा है । यह "देखो" अर्थात् "अनुभव" करो, इसका "भान" करो । 

कितनी सरल बात ! कितनी सुगम !!

जय श्री कृष्णा

व्यास एन बी 

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dear one you yourself are saying to see the unseen, isn't it contradictory statement. when some thing is considered as unseen to expect tto see that with physical eyes is not possible. for instance air is unseen but people recognize it when it touches their body then only they can feel unseen air same is the case with God. that is the reason that we are advised to see God with inner view. that inner view is self introspection and meditation. I will give a personal example. one night some twenty years back i along with my wife in vizag were left alone on the sea beach late at about 1 AM.  we came up on the road whole thing was dead silent and not even a street dog was visible. this happened  due to the charm and cool breeze we were lost in sleep and could not judge the passing of time. as my wife was with me I got nervous and prayed intensely to my ishta.  and lo a police man appeared on the spot and we were escorted to our place of stay. now I have seen and felt the presence of God in that police man. this is one such example that could make me see and feel the unseen.

c. k. kaul



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Posted by: Sadhak <sadhak_insight@yahoo.com>
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