Wednesday, November 19, 2014

[gita-talk] How is one to not see the "IS NOT" (unreal) and only see the "IS" (real, existent) ?

 



It is said :   'he who sees in all perishing beings,  the Paramatma (God) who is beyond destruction and is established in the form of equanimity  (who does not see the IS-NOT and only sees the IS "Real, Existence"),  he alone, in fact sees.   
The dilemma is  (even on reading too it is not understood,   that how is one to do so?)  That not to see the IS-NOT (non-existence,  unreal,  the perishable)  and only see the IS (real, existence) ?   [because "IS NOT" even though is is not there, it is seen,  and the "IS" even though it exists,  it is not visible?]   

If someone has seen the "IS" (then please giving current example, will be more relevant),  then please share, and also include how (with what rituals, actions, austerities, magical powers) he was able to see the unseen "IS" in the seen "IS NOT"  




कहा है : 'जो नष्ट होते हुए सम्पूर्ण प्राणियोंमें परमात्माको नाशरहित और समरूपसे स्थित देखता है (नहीं' को न देखकर केवल 'है' को देखता है)वही वास्तवमें सही देखता है ।'
समस्या है (पढ़कर भी समझमें नहीं आया है कि कैसे ऐसा हो?) कि 'नहीं' को न देखकर केवल 'है' को कैसे देखा जाय? [ क्योंकि 'नहीं' तो नहीं होते हुये भी दीखता है और 'है' होते हुये भी दीखता ही नहीं? ] 
यदि किसीने 'है' को देखा हो [ कृपया आजके उदाहरण देना अधिक प्रासंगिक होगा ] तो कृपया बताया जाय और यह भी कि उसने न दीखनेवाले 'है' को दीखनेवाले 'नहीं' में कैसे (विधि, क्रिया, तपस्या, दिव्यचक्षु आदि) देख पाया? 
सविनय,
साधक 


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Respected Divine Sadhaks

While reading the question, an old stanza - given below -  heard from the Pravachans of Swamiji came to my mind.  

Hai So Sunder Hai Sadaa, Nahin So Sunder Naahin
Nahin So Pargat Dekhiye Hai So Deekhe Naahin!!!

I seek your forgiveness if it is irrelevant in the context.

Regards

m m batra

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हरि ओम

हमेशा की तरह ही सविनय साधक महाशय का प्रश्न है ! जो समझने का विषय ही नहीं है, बस वहीसमझना चाहते हैं । बड़ी समस्या है यह उनकी - हमेशा वही जानना चाहते हैं , जो ज्ञान का विषय ही नहीं है । ख़ैर यह कोई नई बात है नहीं , उनका यह रोज़ का काम है । फिर भी उत्तर तो देना ही पड़ेगा । 

भैया, आपने स्वयं लिखा है ना कि "है होते हुए भी दीखता नहीं " - लिखा है ना ? लिखा है कि नहीं ? लिखा है । आपकी बात गलत नहीं है । सन्तों की वाणी में भी आया है - " है सो सुन्दर है सदा, नहीं सो सुन्दर नाहीं । नहीं सो प्रकट देखिये, है सो दीखे नाहीं ।। " - तो भैया यहाँ चक्षुओं को, मन को, बुद्धि को, शरीर को लेकर आप कुछ नहीं कर सकते । जो चीज दीखने में आती ही नहीं, आप ख़ुद भी इस बात को मानते हैं, तो फिर आपका यह प्रश्न कि किसी ने देखा हो तो बताओ, यह प्रश्न क्या कोई समझदार का प्रश्न है ? कौन क्या उदाहरण देगा, कैसे देगा ? विचार तो कीजिये ! " आकाश का फूल " होता ही नहीं, आप जानते हैं और जानने के बावजूद पूछते हैं कि यदि किसीने आकाश का फूल देखा हो, तो उदाहरण दो । अब जो चीज़ होती ही नहीं है, उसका कोई क्या उदाहरण देगा ? उसी प्रकार जो दीखती ही नहीं, उसे देखने का कोई क्या उदाहरण देगा ? यह तो हुई " नहीं" द्वारा "है" को देखने की बात । 

शास्त्रों में जो " देखने" की बात आई है , वह " पश्यति " है । वहाँ आंखों से देखना नहीं है, " भान" होना है, " अनुभव " होना है । वहाँ आँखों की, विधि की, क्रिया की, तपस्या की या दिव्य चक्षुओं की बात ही नहीं है - आप क्यों माथा खपा रहे हैं कि चक्षुओं से कैसे देखें ? वह देखना "नहीं " के द्वारा होता ही नहीं ! वहाँ "देखना" शब्द का मतलब "अनुभव" करना है, समझना है - उसमें " नहीं" क्या करेगा ? आप "स्वयं" हैं-  हैं ना ? अब इसको देख सकते हो क्या ? ख़ुद को " देख" सकते हो क्या ? कभी देखा है ? कभी मन में आई है क्या कि ख़ुद को कैसे देखू ? क्यों नहीं मन में आई ? क्योंकि वहाँ संदेह है ही नहीं। लेकिन " मैं हूँ " - यह अनुभव तो सबको है - आपको, मुझे सबको है । पशु, पक्षी भी "मैं हूँ" यह अनुभव करते हैं । अब यहाँ चक्षु क्या करेंगे ? शास्त्रों में , जो "देखने" की बात कहीं है, वह "अनुभव" करने का द्योतक है ! " नहीं" ठहरता ही "है" के कारण है । "है" स्क्रीन पर ही आप "नहीं" फ़िल्म चलती देख सकते हैं । यह अनुभव का विषय है- चक्षुओं का, तपस्या का, क्रिया का विषय है ही नहीं । अब आप लगें ांय उदाहरण ढूँढ़ने में  । अब आपको क्या कहें ?  निरन्तर परिवर्तनशील तत्व उसी को "दिखता" है जो स्वयं अपरिवर्तनशील होता है । "है" ही "नहीं" का प्रकाशक होता है ! विनाशी तत्व अविनाशी प्लेटफ़ार्म के बिना दिखेगा कैसे ? जब सिनेमा चलता है, तो स्थिर स्क्रीन दिखती है क्या ? लेकिन समझदार आदमी तो जानता है ना कि बिना स्थिर स्क्रीन के फ़िल्म कैसे चलेगी ! बस यही जानना शास्त्रों में "देखना" नाम से बताया गया है ! शास्त्र यही कहते हैं कि विनाशी स्चलतीुई फ़िल्म के पीछे अविनाशी स्क्रीन को देखो । विनाशी किसी अविनाशी प्लेटफ़ार्म पर ही दृष्टिगोचर हो रहा है । यह "देखो" अर्थात् "अनुभव" करो, इसका "भान" करो । 

कितनी सरल बात ! कितनी सुगम !!

जय श्री कृष्णा

व्यास एन बी 

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dear one you yourself are saying to see the unseen, isn't it contradictory statement. when some thing is considered as unseen to expect tto see that with physical eyes is not possible. for instance air is unseen but people recognize it when it touches their body then only they can feel unseen air same is the case with God. that is the reason that we are advised to see God with inner view. that inner view is self introspection and meditation. I will give a personal example. one night some twenty years back i along with my wife in vizag were left alone on the sea beach late at about 1 AM.  we came up on the road whole thing was dead silent and not even a street dog was visible. this happened  due to the charm and cool breeze we were lost in sleep and could not judge the passing of time. as my wife was with me I got nervous and prayed intensely to my ishta.  and lo a police man appeared on the spot and we were escorted to our place of stay. now I have seen and felt the presence of God in that police man. this is one such example that could make me see and feel the unseen.

c. k. kaul



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Posted by: Sadhak <sadhak_insight@yahoo.com>
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