Tuesday, November 4, 2014

[gita-talk] How did the Existent Self become an embodied soul (jeev)?

 


Swamiji has said -  Jeev (embodied soul) itself falls into bondage and becomes liberated.  But the Existent Self embodiment of Self, itself neither becomes a doer nor an enjoyer;  nor happy,  nor sad,  nor bound,  nor liberated. 
 
Sadhak would like to know -  When the Existent Self neither becomes a doer,  nor enjoyer,  nor happy, nor sad,  nor bound,  nor liberated,  then where did that "jeev" (embodied self) come from?   (How did the Existent Self become an embodied soul (jeev)?)   If the Self became 'jeev' (embodied soul),  then why did Swamiji call it beyond any state (avasthateet) ?  
 
Please explain in simple language? 
 
HINDI
 
स्वामीजीने कहा है : जीव ही बन्धनमें पड़ता है और मुक्त होता है। परन्तु 
सत्तास्वरूप स्वयं न कर्त्ता बनता है, न भोक्ता; न सुखी होता है, न दुःखी; 
न बँधता है, न मुक्त होता है। 
साधककी जिज्ञासा है : जब सत्तास्वरूप स्वयं न कर्त्ता बनता है, न भोक्ता 
बनता है, न सुखी होता है, न दुःखी होता है, न बँधता है, न मुक्त होता है 
तब जीव कहाँसे आया? (सत्तास्वरूप स्वयं कब जीव बना?) यदि स्वयं ही 
जीव बना तो उसे स्वामीजीने अवस्थातीत क्यों कहा है?
कृपया सरल भाषामें समझायें। 
सविनय,
साधक  
 
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बड़े भैया,
जब स्वयं न कर्ता है और न ही भोक्ता है, जब स्वयं न कर्ता बन सकता है और न ही भोक्ता बन सकता है, तो यह जो आचार-व्यवहारमें लानेके लिये यम-नियम प्रचलित हैं, वह किसके लिये हैं? शरीर, मन, बुद्धि (अक्कल) आदिके लिये?
जो जड़ हैं और जिनका अस्तित्त्व है ही नहीं। इसीलिये समझ नहीं आ रहा। 
अस्तु। 
सविनय,
साधक (साधक वह जो सिद्ध नहीं है) 

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Dear Saadhaks,

> When the Existent Self neither becomes a doer,  nor enjoyer,  nor happy, nor sad,  nor bound,  nor 
> liberated,  then where did that "jeev" (embodied self) come from?   (How did the Existent Self become > an embodied soul (jeev)?)  

This question arises,  because,  humans chose to speculate on God,  instead of getting the knowledge of Brahman,  from Veda, geetA and brahma-sootras.

Did SriKrishNa teach us that God becomes Jeeva ?.   
Did Veda teach us that God becomes Jeeva ?
Did Brahma-sootras teach us that God becomes Jeeva ?.

No, not at all.   In fact,  brahma-sootras teaches quite the opposite.

Please study  "Om bheda vyapadeshaat Om"  and "Om bhEda vyapadeshaat ca anyaha Om"
Please study munDaka.   "tayOr anyaha pippalam svAdu atti anashnan anyO abhishAkasheeti".

Just as questions on God ( such as the one asked above )  should not come from our speculations on God,   the answer to such questions, also should not come from our speculations on God.

So, the real question is,  who started these speculations in the first place ?.   Having created a  problem first,  now we are  giving out a solution for it  too ?.

brahma-vidyA is the only medicine for all such speculative Q&A.   Such speculative Q&A clearly indicate the 'need'  for studying the works of Sri VedavyAsa and studying vedOpanishats.

Regards,
Jay N.

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Dear Sadaks,
The Jeeva, Paramathuma are in our body. Jeeva took form to complete its Karmas. Paramathuma is witness to it in our body. If Jeeva completes its Karmas according to sastras, The Paramathuma WHO stood witness delivers GYANA. Then Jeeva goes to the abode of Paramathuma. Jeeva fails and accumulates further Karmas like Aagami, Sanchita and Prarabdha, the Paramathuma again put the jeeva in a womb based on karmas.

The said fact is in Geetha also.

B.S.

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हरि ओम

कितना दिमाग़ लगाते हैं आप ? क्यों लगाते हैं ? बुद्धि को खूँटी पर टाँग क्यों नहीं देते ? ये कोई काम की चीज़ नहीं है ! काम की चीज़ है - सन्तों की बातों पर विश्वास, शास्त्रों पर विश्वास , बुद्धि की बजाय विवेक का प्रयोग ! क्या ऐतराज़ है आपको , बुद्धि को खूँटी पर टाँगने में ? बताईये ! ़जड़ वस्तु चेतन तक पहुँच जायेगी क्या ? आप विनाशी बुद्धि से अविनाशी स्वयं को समझ लेंगे क्या ? बाबा....बुद्धि मत लगाओ , जो चीज है ही नहीं, असत् है, उसके पीछे लाठी लेकर क्यों घूम रहे हो ? पता नहीं क्या जँची है आपको ? अक्कल है ही नहीं, लगाने से क्या लाभ ? 

सत्ता स्वरूप स्वयं कर्ता आदि है नहीं मान लेता है ! स्वयं न कर्ता होता है, न भोक्ता होता है, प्रत्युत् "बन जाता है" अर्थात् वह कर्ता भोक्ता स्वयं को मान लेता है ! होता नहीं है, मान लेता है ! रस्सी को साँप मान लेता है ! रस्सी साँप होती थोड़े है, मान ली जाती है ! आप कर्ता होते थोड़े ही हो, स्वयं को कर्ता मान लेते हो ! अब आपको रोकने वाला कौन है ? आप साधक हो नहीं, ख़ुद को साधक मान लो, तो कोई आपको मानने से रोक सकता है क्या ? पागल राजा होता नहीं, लेकिन कई बार ख़ुद को राजा मान लेता है, कहता है " मैं राजा हूँ ", तो कोई उसको राजा मानने से रोक सकता है क्या ? लेकिन वह राजा होता है क्या ? है तो पागल ही ! 

तो भैया, जीव "मान्यता" से आया है ! गधा कहे कि मैं घोड़ा हूँ, तो घोड़ा हो थोड़े ही गया, मान लिया ! जीव भी स्वयं को शरीर मान लेता है, उससे वह शरीर हो थोड़े ही जाता है । रहेगा तो जीव सदैव अकर्ता , अभोक्ता आदि ही ! स्वामीजी, शास्त्र, गीता आदि भी यही कहते, आप भी यह कहना  शुरू कर दो , अक्कल को बीच में क्यों घसीटते हो ? सीधी साधी बात है ना ? अक्कल लगाने से कितनी टेढी हो जाती है ? इसलिये अपनी अक्कल लगाना बन्द कर दीजिये ! 

प्रश्न है - " स्वयं "  को स्वामीजी ने "अवस्थातीत " क्यों कहा ? भैया, इसलिये कहा क्योंकि स्वयं अवस्थातीत ही है !!! अब अवस्थातीत को अवस्थातीत नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे ? अब अगर वह अवस्थातीत होते हुए भी स्वयं को किसी अवस्था में मान ले तो उससे उसके अवस्थातीत पने में क्या फ़र्क आया ? आप अपने को शरीर मान लेते हो तो क्या आप शरीर हो जाते हो ? मानने से आपका स्वरूप थोड़ा ही बदल जाता है , अनुभव बदलता है ! रस्सी को साँप मानने से रस्सी साँप हो थोड़े ही जाती है ? आपको भय का अनुभव ज़रूर हो जाता है ! तो स्वरूप नहीं बदलता , साधक जी महाराज, "मान्यता" बदल जाती है और तदनुसार अनुभव होने लगते हैं ! कितनी सरल बात .....!!!!!


जय श्री कृष्णा

व्यास एन बी  




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Posted by: Sadhak <sadhak_insight@yahoo.com>
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