Tuesday, November 4, 2014

[gita-talk] Fw: One or Infinite Aatmas in Us ? Please Enlighten.

 


Swamiji says :   Your Aatma (soul) is all pervading,  then even in a dog is your Aatma.   It is a sadhak's question :   the dog's aatma (soul) [if it exists] it too is all pervading,  then even in us is a dog's aatma (soul).   Then either there are infinite aatmas in us,  or there is one aatma which is present in all (infinite)  beings (jeevs).   In fact what is the truth ?    Can some sadhak (or a siddha)  shed some light on this ?  Humbly speaking
 
HINDI     
स्वामीजीने कहा है : आपकी आत्मा सर्वव्यापी है तो कुत्तेमें भी आपकी आत्मा है।साधकका प्रश्न है : कुत्तेकी आत्मा (यदि होती है)
भी तो सर्वव्यापी है तो हममें भीकुत्तेकी आत्मा है। फिर या तो हममें अनंत आत्मायें हैं, या फिर केवल एक आत्माहै जो सभी (अनंत)जीवोंमें
व्याप्त है।वास्तविक सत्य क्या है? क्याइसपर कोईसाधक (या सिद्ध)प्रकाश डालेगा?सविनय, 
 
साधक
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श्री ck_kaul जी!
कथन if this life force leaves समझना है। 
गीतामें परमात्मा, आत्मा (या स्वयं या स्वरूप) को सर्वगत (सबमें परिपूर्ण) बताया है फिर वह कैसे किसीको छोड़कर और कहाँ जा सकता है? कोई जा भी वहीं सकता है जहाँ वह पहलेसे न हो जबकि सर्वगत आत्मा तो पहलेसे ही सबमें परिपूर्ण है अथवा गीता (2 : 24 ) में सर्वगत शब्द गलत प्रयुक्त हुआ है जो संभव नहीं।  
आप इस परमात्मा या आत्मा को जिस force शब्दसे समझा रहे हैं वह force कभी होता है और कभी नहीं होता है, कहीं होता है और कहीं नहीं होता है और वह सर्वगत तो है ही नहीं अत: दृष्टांत पूरा सही नहीं बैठता और इसीलिये समझना हुआ नहीं। 
सविनय,
साधक 

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मुक्ताभिमानी मुक्तो हि
बद्धो बद्धाभिमान्यपि।
किवदन्तीह सत्येयं
या मतिः सा गतिर्भवेत्॥११॥

स्वयं को मुक्त मानने वाला मुक्त ही है और बद्ध मानने वाला बंधा हुआ ही है, यह कहावत सत्य ही है कि जैसी बुद्धि होती है वैसी ही गति होती है |

bhaktesh  bhatt

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dear  the example of electricity was quoted only to understand the existence of aatma in every thing. do you agree that all that exists inert or live is kept alive with some sort of life force, and if this life force leaves rocks become sand and the sand becomes earth that the things get disintegrated in five basic elements.. strange enough this life force is functional in the same manner in every case. unless and until this life force is one and the same  it can not function uniformly in all the things the way its is. now following swami ji you must be having faith in isha wasam idam sarvam or God is omnipresent,  if so, then how come there can be two only one god as every thing visible or invisible, otherwise God can not be omnipresent. thus there should be no confusion in seeing one in all and all as different manifestations of the same God.

ck_kaul


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हरि ओम

आजकल इस फ़ोरम पर एक ही व्यक्ति के प्रश्न आते हैं, यह कहाँ तक ठीक है- मोडरेटर्स जाने ! इस प्रश्न के विषय में स्वामीजी की कुछ बातें ग़ौर-तलब हैं - जैसे, 
Quote
" आजकल वेदान्त पढ़ने वालों से प्राय: यह भूल होती है कि वे " देही बनकर " ज्ञान की बातें करते हैं ( जैसे इस प्रश्न में - "मेरी आत्मा", " कुत्ते की आत्मा " आदि ) , अपने को छेड़ते ही नहीं !!!! वह केवल सीखा हुआ ज्ञान होता है ! ऐसे ज्ञानवाला बद्धज्ञानी हो जाता है । फिर उसको बोध नहीं हो सकता । अपने को एकदेशीय मानकर , अपने को वैसा-का-वैसा रखकर "वासुदेव सर्वम्" देखने वाला "ब्रह्म राक्षस" हो जायगा । "
Unquote 
ऐसा क्यों ? क्योंकि स्वयं को तो अलग ही मानता है और फिर समझने का प्रयास करता है, खण्डन, मण्डन, शक, सुबहा, सन्देह करता है ! दरअसल "वासुदेव सर्वम्" सीखने की वस्तु है ही नहीं, यह अनुभव करने की वस्तु है ! अनुभव कैसे होता है ? 

Quote

जैसे "मैं हूँ" - इसका अनुभव होता है, इसमें कोई सन्देह नहीं होता, ऐसे ही "वासुदेव सर्वम्" का अनुभव होना चाहिये । अनुभव की पहचान क्या है ? पहचान यह है कि राग-द्वेष सर्वथा मिट जायं, सुखासक्ति सर्वथा मिट जाय ! "मैं-तू-यह-वह" नहीं रहे, केवल " है " ही रहे ! 

Unquote

यह "है" एक सत्ता मात्र है ! "है" में सब एक हो जाते हैं ! यही मूल में " अद्वैत " है ।

जय श्री कृष्णा

व्यास एन बी

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श्री Jay N जी !
यदि सभीमें एक ही (सर्वगत) आत्मा नहीं है तो कृपया यह 
और बता दें कि अभी तक कुल कितनी आत्मायें अस्तित्त्वमें 
आयी हैं और कितनी अभी भी अस्तित्त्वमें हैं?
सविनय,
साधक  
श्री ck_kaul जी एवं श्री BS जी !
वस्तुत: विद्युत (जो कहीं है और कहीं नहीं है) का उदाहरण (सर्वगत) 
आत्मा पर पूरा सही नहीं बैठता। 


सविनय,
साधक 

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dear sadhak ji aatma is just like electricity which when enters any electronic instrument makes it function as per the status of the instrument. just so simple yes so far soul is concerned is same allover in every thing live or inert. in absence of this theory to consider vasudeva sarvam is not possible. swami ji speaks ultimate truth it is we who should do some manan. I am sure swami ji will clear the doubts directly.
ck_kaul
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Dear Sadaks,
GOD is said in many scripts, in Geetha, Upanashids as APPRAMEYAM (That cannot be seen by senses) Now electricity cannot be seen, but can be believed on a bulb glowing. Same electricity is in TV, Computer Etc Etc. So ONE PARAMATHUMA is in many things, like DOG, PIG etc. Why Dog or Pig is different question.
B.S
 
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What is Atma(Soul)? Is it not simple vibration of the heart? Does  this vibration differ from the vibration of the cosmic   "AUM" ??  Then why so much of queries? Any creature having "Chetana",will very easily realize it and drown within it so as to escape the cycle of repeated birth and death. Barin Chatterjee

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When we are unconscious of our absolute nature, we see, think and behave in accordance to how we see and understand our selves and our relationshipm with it. YPId we grow, we evolve in ascending consciousness and embrace the word until we see, think and behave.
Ayam ninja paro veti, gananaa laghu cheatassaam/
Udaara charaitaanaam to, vasudhaiva kutumbakam//

In the meantime, we are all at varying points on the Grand Highway....gosh I have long long long way ahead, and nobody is waiting for me....selfish sadhus.

Raviji
 
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One or many Atma --- please enlighten.

Dear All,

The only answer is study veda/geeta/sootras properly.   No need for any other enlightenment.

The fact that there are enlightened and not-so enlightened people, should tell you that Atma is not the same in all.
The fact that you are not dog,  should have told you that your Atma is not the same Atma in the dog.
...
In the GeetA,  SriKrishNa never said  Arjuna and SriKrishNa had the same Atma.

This being the case,  the real question is,  who started the belief that there is only one  Atman ?.    Correction should begin there.

Regards,
Jay N.



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राम राम बड़े भैया !
बात बहुत कुछ समझमें आयी। 
धन्यवाद। 


सविनय,
साधक 
 
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हरि ओम

वास्तविक सत्य वही है जो स्वामीजी ने कहा है ! ये जो स्वामीजी की बातें आप उद्धृत करते हैं, यह अटल सत्य हैं, और आपको " वासुदेव सर्वम्" की तरफ़ इंगित करती हैं ! आप ये जो अपनी बुद्धि से इसको समझने का प्रयत्न करते हैं, यह कोई बहुत लाभदायक तरीक़ा नहीं है ! आप विश्वास करना सीखें ! जब स्वामीजी ने कोई बात कही है तो मान लीजिये ! यह बुद्धि का विषय ही नहीं है, क्यों फिर आप मान नहीं लेते ? क्या " तो हममें भी कुत्ते की आत्मा है" ? आप सबसे पहले स्वाध्याय करें, साधक संजीवनी पढें ! आपके मन में जो भी बात आये, उसे पूछने की बजाय स्वाध्याय करें ! "आपकी" आत्मा, "मेरी" आत्मा, "कुत्ते" की आत्मा - सब एक हैं - एक ही तत्व है जोविभिन्न रूपों में भास रहा है ! विभिन्न रूपों में भासने का कारण आपकी "मान्यता" है - आपकी "स्वीकृति" है ! अब जब तक आप "कुत्ते की आत्मा" , "मेरी आत्मा", अनन्त आत्मायें , आदि यहमान्यता रख कर अपनी बुद्धि से समझने का प्रयत्न करेंगे तो आपको कुछ हासिल नहीं होगा, उल्टा कुत्ते की आत्मा आदि उदाहरण देकर आप हास्यास्पद बनेंगे ! यहाँ शब्द कुत्ता, गधा आदि महत्वपूर्ण नहीं है, केवल एक ही परमात्मा ( परम+ आत्मा) विभिन्न रूपों में भासता है, यह महत्वपूर्ण है ! मूल में केवल एक ही तत्व है, बाक़ी सब "मान्यता" के कारण "बने हुए" हैं, हैं नहीं ! क्या जँची ? अब इसको आप " मान लें" और आगे बढ जायें तब तो लाभ होगा, और अपनी निरन्तर परिवर्तन शील , तुच्छ बुद्धि लगायें तो लगाते रहो - कुछ हासिल नहीं होगा ! 

स्वामीजी जैसे सनातन धर्म के सन्त की बातें मिलने के बाद, उनकी बातों पर अपनी बुद्धि लगाना , कोई बुद्धिमानी की बात नहीं है ! मान लो - मानना आता है ना ? जब आप इस जन्म के पिता को भी मानते ही हो, जानते नहीं, तो फिर परम+आत्मा, परमपिता को मानने में संकोच क्यों ? क्या लगा रहे हो आप ? अपनी बुद्धि !!! यह बुद्धि अपने कारण प्रकृति को भी नहीं जान सकती तो फिर आत्मा, परमात्मा को कैसे जानेगी ? सोचिये तो सही ! स्वाध्याय कीजिये, विश्वास करना सीखिये ! वरना स्वयं का और दूसरों का समय व्यर्थ करने के अलावा कुछ हासिल नहीं होगा ! 
जय श्री कृष्णा

व्यास एन बी 
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Dear Sadhakas, Namaskar,

Atma, Soul is a chetana of every biological cell of a life form...the chetana is the Genetic Material
present in every of the trillion trillion cells of the physical body. Genetic Material is Purusha and
body is Prakruti.

Genetic Material is the Shariri and body is Sharir

Gee Waman
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Dear Sir/Madam,

We all have only one ATMA (soul, which lives for ever). We need to keep it happy
by Good Karma (Thinking Divine, 24/7). Not a whole lot else will be enough.

Bye, Good Luck.
 
Notesav
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Swami,
Kindly translate in English
B.Sathya
 
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Hindi :       www.swamiramsukhdasji.org
 
 
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Posted by: Sadhak <sadhak_insight@yahoo.com>
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