Monday, October 20, 2014

[gita-talk] How did the Existent Self become an embodied soul (jeev)?

 



Swamiji has said -  Jeev (embodied soul) itself falls into bondage and becomes liberated.  But the Existent Self embodiment of Self, itself neither becomes a doer nor an enjoyer;  nor happy,  nor sad,  nor bound,  nor liberated. 
 
Sadhak would like to know -  When the Existent Self neither becomes a doer,  nor enjoyer,  nor happy, nor sad,  nor bound,  nor liberated,  then where did that "jeev" (embodied self) come from?   (How did the Existent Self become an embodied soul (jeev)?)   If the Self became 'jeev' (embodied soul),  then why did Swamiji call it beyond any state (avasthateet) ?  
 
Please explain in simple language? 
 
HINDI
 
स्वामीजीने कहा है : जीव ही बन्धनमें पड़ता है और मुक्त होता है। परन्तु 
सत्तास्वरूप स्वयं न कर्त्ता बनता है, न भोक्ता; न सुखी होता है, न दुःखी; 
न बँधता है, न मुक्त होता है। 
साधककी जिज्ञासा है : जब सत्तास्वरूप स्वयं न कर्त्ता बनता है, न भोक्ता 
बनता है, न सुखी होता है, न दुःखी होता है, न बँधता है, न मुक्त होता है 
तब जीव कहाँसे आया? (सत्तास्वरूप स्वयं कब जीव बना?) यदि स्वयं ही 
जीव बना तो उसे स्वामीजीने अवस्थातीत क्यों कहा है?
कृपया सरल भाषामें समझायें। 
सविनय,
साधक  
 
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Dear Sadaks,
The Jeeva, Paramathuma are in our body. Jeeva took form to complete its Karmas. Paramathuma is witness to it in our body. If Jeeva completes its Karmas according to sastras, The Paramathuma WHO stood witness delivers GYANA. Then Jeeva goes to the abode of Paramathuma. Jeeva fails and accumulates further Karmas like Aagami, Sanchita and Prarabdha, the Paramathuma again put the jeeva in a womb based on karmas.

The said fact is in Geetha also.

B.S.

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हरि ओम

कितना दिमाग़ लगाते हैं आप ? क्यों लगाते हैं ? बुद्धि को खूँटी पर टाँग क्यों नहीं देते ? ये कोई काम की चीज़ नहीं है ! काम की चीज़ है - सन्तों की बातों पर विश्वास, शास्त्रों पर विश्वास , बुद्धि की बजाय विवेक का प्रयोग ! क्या ऐतराज़ है आपको , बुद्धि को खूँटी पर टाँगने में ? बताईये ! ़जड़ वस्तु चेतन तक पहुँच जायेगी क्या ? आप विनाशी बुद्धि से अविनाशी स्वयं को समझ लेंगे क्या ? बाबा....बुद्धि मत लगाओ , जो चीज है ही नहीं, असत् है, उसके पीछे लाठी लेकर क्यों घूम रहे हो ? पता नहीं क्या जँची है आपको ? अक्कल है ही नहीं, लगाने से क्या लाभ ? 

सत्ता स्वरूप स्वयं कर्ता आदि है नहीं मान लेता है ! स्वयं न कर्ता होता है, न भोक्ता होता है, प्रत्युत् "बन जाता है" अर्थात् वह कर्ता भोक्ता स्वयं को मान लेता है ! होता नहीं है, मान लेता है ! रस्सी को साँप मान लेता है ! रस्सी साँप होती थोड़े है, मान ली जाती है ! आप कर्ता होते थोड़े ही हो, स्वयं को कर्ता मान लेते हो ! अब आपको रोकने वाला कौन है ? आप साधक हो नहीं, ख़ुद को साधक मान लो, तो कोई आपको मानने से रोक सकता है क्या ? पागल राजा होता नहीं, लेकिन कई बार ख़ुद को राजा मान लेता है, कहता है " मैं राजा हूँ ", तो कोई उसको राजा मानने से रोक सकता है क्या ? लेकिन वह राजा होता है क्या ? है तो पागल ही ! 

तो भैया, जीव "मान्यता" से आया है ! गधा कहे कि मैं घोड़ा हूँ, तो घोड़ा हो थोड़े ही गया, मान लिया ! जीव भी स्वयं को शरीर मान लेता है, उससे वह शरीर हो थोड़े ही जाता है । रहेगा तो जीव सदैव अकर्ता , अभोक्ता आदि ही ! स्वामीजी, शास्त्र, गीता आदि भी यही कहते, आप भी यह कहना  शुरू कर दो , अक्कल को बीच में क्यों घसीटते हो ? सीधी साधी बात है ना ? अक्कल लगाने से कितनी टेढी हो जाती है ? इसलिये अपनी अक्कल लगाना बन्द कर दीजिये ! 

जय श्री कृष्णा

व्यास एन बी  

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